आज का इतिहास: एअर इंडिया की फ्लाइट में रखे बम ने ली 329 लोगों की जान, बब्बर खालसा के जिस आतंकी के बैग में बम था उसका आज तक पता नहीं चला


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9 मिनट पहले

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23 जून 1985। टोरंटो का पियरसन इंटरनेशनल एयरपोर्ट। यहां से एअर इंडिया के विमान ‘कनिष्क’ ने उड़ान भरी। ये विमान टोरंटो से मुंबई आ रहा था और रास्ते में मॉन्ट्रियल, लंदन और दिल्ली में इसे रुकना था। विमान अगले दिन अपने पहले स्टॉप मॉन्ट्रियल में रुका और यहां से लंदन के लिए उड़ान भरी। विमान यूरोप की सीमा में दाखिल हुआ और अगले 45 मिनट में लंदन पहुंचने वाला था, लेकिन इससे पहले ही अटलांटिक सागर के ऊपर उसमें जोरदार धमाका हुआ और जलता हुआ विमान सागर में गिर गया। विमान में सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई।

हादसे में मारे गए कुल 329 लोगों में से 268 कनाडा, 27 इंग्लैंड, 10 अमेरिका और 2 भारत के नागरिक थे। जहाज के क्रू में शामिल सभी 22 भारतीय भी मारे गए। केवल 132 लोगों के शव ही समुद्र से निकाले जा सके।

भारत और कनाडा ने हादसे की जांच शुरू की जिसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ। जांच में पता चला कि विमान में विस्फोटकों से भरा एक बैग रखा था, जिसमें धमाका होने की वजह से विमान हादसे का शिकार हुआ। एजेंसियों ने इस हमले के पीछे उग्रवादी सिख संगठन बब्बर खालसा को जिम्मेदार ठहराया। जांच में ये भी पता चला कि विमान में कोई एम सिंह नामक यात्री को सवार होना था, लेकिन वो सवार नहीं हुआ। केवल उसका सामान ही विमान में लोड किया गया। उसी सामान में विस्फोटक था। एजेंसियों को आज तक नहीं पता कि ये एम सिंह कौन था।

हादसे के बाद समुद्र में पड़ा विमान का मलबा।

हादसे के बाद समुद्र में पड़ा विमान का मलबा।

पांच महीने बाद दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया। एक था तलविंदर सिंह परमार और दूसरा इंदरजीत सिंह रेयात। हालांकि तलविंदर पर आरोप सिद्ध नहीं हो सके और वो रिहा हो गया। इंदरजीत सिंह रेयात को साल 2003 में 5 साल की सजा सुनाई गई। उसको बम बनाने से लेकर उसकी टेस्टिंग और हत्या जैसे कई आरोपों में दोषी पाया गया।

आतंकवादियों का प्लान एअर इंडिया के एक और विमान में विस्फोट करने का था, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका। आतंकवादियों ने इसी तरह का एक बम वैंकुवर से बैंकॉक जाने वाली एअर इंडिया की फ्लाइट 301 को निशाना बनाने के लिए रखा था। ये बम वैंकुवर से टोक्यो के एयरपोर्ट पर पहुंचा और एक विमान से दूसरे विमान में सामान ट्रांसफर करते वक्त ही फट गया। इस हादसे में एयरपोर्ट के दो कर्मचारी मारे गए। रेयात को इस मामले में भी 10 साल की सजा सुनाई गई।

कहा जाता है कि ये दोनों हमले ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेने के लिए किए गए थे। 1984 में भारतीय सेना ने अमृतसर के सिख मंदिर में खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह भिंडरावाले को मार गिराया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश के बाद ये ऑपरेशन शुरू हुआ था जिसमें कई लोग मारे गए थे। इस ऑपरेशन ने सिखों में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ गुस्सा भर दिया था और उसी साल उनके दो सिख बॉडीगार्ड ने उनकी हत्या कर दी थी।

1980: विमान हादसे में संजय गांधी की मौत

इंदिरा गांधी के दो बेटे थे – संजय और राजीव। राजीव को राजनीति में कोई खासी दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए वे राजनीति से जुड़े ज्यादातर फैसलों में कम ही शामिल होते थे। इसके उलट संजय गांधी हर मसले पर अपनी मां के साथ चर्चा किया करते थे।

कहा जाता है कि अगर संजय गांधी जिंदा होते तो अपनी मां इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत उन्हीं को मिलती।

संजय गांधी को राजनीति में दिलचस्पी तो थी ही, इसके साथ ही साथ संजय एक मंझे हुए पायलट भी थे और उन्हें विमान उड़ाने का बेहद शौक था।

कहा जाता है कि संजय गांधी विमान को भी कार की तरह चलाते थे। अपने इस शौक को पूरा करने के लिए उन्होंने एक खास विमान पिट्स S2A भारत मंगवाया था। ये विमान हवा में कलाबाजियां दिखाने के लिए मशहूर था। संजय ने इस विमान में पहली बार 21 जून को दिल्ली के सफदरजंग हवाई अड्डे से उड़ान भरी थी। अगले ही दिन संजय ने इंदिरा गांधी और मेनका गांधी को भी इस विमान भी बैठाकर आसमान की सैर कराई।

राजीव और संजय के साथ इंदिरा गांधी। 1984 में इंदिरा गांधी और1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी।

राजीव और संजय के साथ इंदिरा गांधी। 1984 में इंदिरा गांधी और1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी।

23 जून 1980 के दिन संजय दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्र्क्टर सुभाष सक्सेना के साथ विमान उड़ाने पहुंचे। सुबह 7 बजकर 58 मिनट पर विमान ने टेकऑफ किया। दोनों हवा में कलाबाजियां दिखा रहे थे, तभी विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया।

विमान तेजी से नीचे गिरने लगा और कुछ ही सेकेंड में जमीन से टकराकर चकनाचूर हो गया। विमान से थोड़ी दूर खून से लथपथ संजय गांधी पड़े थे और सुभाष सक्सेना के दोनों पैर विमान के मलबे में दब गए थे। फौरन एयरपोर्ट से फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस आई।

पीछे-पीछे इंदिरा गांधी भी घटनास्थल पर पहुंचीं और दोनों को अस्पताल ले जाया गया। इंदिरा गांधी खुद एंबुलेंस में सवार होकर साथ ही अस्पताल पहुंचीं। डॉक्टरों ने सुभाष सक्सेना और संजय गांधी दोनों को मृत घोषित कर दिया।

930: दुनिया की पहली संसद की स्थापना

आज ही के दिन साल 930 में आइसलैंड में दुनिया की पहली संसद को शुरू किया गया था। इसे आल्थिंग कहा जाता है। ये संसद आज भी काम करती है और इसे दुनिया की सबसे पुरानी संसद माना जाता है।

उस समय आइसलैंड के छोटे-छोटे वंशों के लोग इस जगह पर आकर चर्चा करते थे। धीरे-धीरे यहां लोगों की संख्या बढ़ने लगी और एक लॉ काउंसिल का गठन किया गया। ये काउंसिल नए कानून बनाती, विवादों का निपटारा करती और लोगों को न्याय दिया करती थी।

हर साल जून में एक असेंबली सेशन भी आयोजित किया जाता था, जो 2 हफ्ते तक चलता था। इस सेशन में सभी लोग शामिल हो सकते थे। हर फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाता था। एक बड़े से पत्थर पर बैठकर, जिसे ‘रॉक ऑफ लॉ’ कहा जाता था, एक आदमी नई योजनाओं और फैसलों को आम लोगों को सुनाता था।

आल्थिंग की स्थापना के 1 हजार साल पूरे होने पर 1930 में एक बड़ा आयोजन किया गया, जिसमें पूरे आइसलैंड के नागरिक शामिल हुए।

आल्थिंग की स्थापना के 1 हजार साल पूरे होने पर 1930 में एक बड़ा आयोजन किया गया, जिसमें पूरे आइसलैंड के नागरिक शामिल हुए।

इस दौरान आइसलैंड पर नॉर्वे और डेनमार्क का कब्जा भी हुआ और आल्थिंग में कई बदलाव भी हुए। साल 1800 में डेनमार्क के राजा ने इसे बंद कर दिया और इसकी जगह एक हाईकोर्ट की स्थापना की गई, लेकिन 1843 में इसे दोबारा शुरू किया गया।

1844 में संसद के लिए पहले चुनाव हुए। उस समय वोट देने का अधिकार 25 साल से ज्यादा उम्र के पुरुषों को ही था, लेकिन साल 1915 में महिलाओं को भी वोट देने का अधिकार दिया गया। फिलहाल इसी संसद से आइसलैंड का सारा कामकाज चलता है।

23 जून के दिन को इतिहास में इन महत्वपूर्ण घटनाओं की वजह से भी याद किया जाता है…

2016: ब्रिटेन के लोगों ने यूरोपियन यूनियन छोड़ने के फैसले को लेकर एक जनमत संग्रह पर वोटिंग की। वोटिंग में 51.9% लोगों ने ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन छोड़ने के पक्ष में वोट किया, वहीं 48.1% लोगों ने विपक्ष में।

2003: भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वायपेयी ने चीन का दौरा शुरू किया।

1961: आर्कटिक संधि लागू की गई। इस संधि के मुताबिक आर्कटिक महाद्वीप का उपयोग केवल वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए ही किया जा सकता है।

1894: इंटरनेशनल ओलिंपिक कमेटी की स्थापना की गई।

1757: रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला को हराकर बंगाल पर कब्जा किया।

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