झारखंड के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट: लोग सरफोका और हरसईन का काढ़ा पीकर कोरोना को भगा रहे, कहते हैं- रैलियों में तो भीड़ जुट रही थी, हमारी बारी आई तो बंदिशें लगा दीं?



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गढ़वा2 मिनट पहलेलेखक: पंकज त्रिपाठी और कुंदन कुमार

गढ़वा जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर की दूरी पर है जाटा पंचायत। यहां के लोग कोरोना से बचने के लिए दो जड़ी का काढ़ा पी रहे हैं। वैक्सीनेशन के बाद पांच लोगों की मौत होने की वजह से अब लोग टीका नहीं लगवाना चाहते।

बंदिशों को लेकर उनमें यह नाराजगी भी है कि शादियों में ज्यादा लोगों को जुटने की इजाजत नहीं दी जा रही, जबकि चुनावी रैलियों में लाखों की भीड़ जुट रही थी। पढ़ें, झारखंड के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट…

गढ़वा जिले के जाटा गांव में कुछ लोग अपने घरों से बाहर खलिहान में तो ब्रम्ह बाबा के चबूतरे के आसपास खटिया लगाकर सो रहे हैं। बीमार घर में रहते हैं। झोला छाप की दवाइयां खाते हैं। परिवार के ठीक सदस्य कोरोना से बचने के लिए या फिर सर्दी, खांसी और बुखार होने पर स्थानीय जड़ी-बूटी का इस्तेमाल करते हैं। इनमें सरफोका और हरसईन की जड़ी प्रमुख है। ये सर्दी-खांसी में इस्तेमाल की जाती है। इसे ही लोग कोरोना से बचने की मुख्य दवा के रूप में ले रहे हैं।

जाटा गांव के एक टोले में तो बीमारी नहीं है, पर दूसरे टोले में हर घर में लोग बीमार हैं। टेस्ट करने प्रशासन की ओर से कोई नहीं आया तो इन लोगों ने स्थानीय झोलाछाप डॉक्टरों से दवाइयां ले ली हैं। फोटो नहीं खिंचवाना चाहते क्योंकि प्रशासन के पकड़कर ले जाने का डर है।

लोग कहते हैं- रक्सैल बाबा की कृपा है, यहां कोरोना-वरोना नहीं आएगा
गांव के लोग स्थानीय कुलदेवता रक्सैल बाबा की पूजा करते हैं। रक्सैल बाबा का यहां एक मंदिर भी है, जहां लोग हर दिन जा रहे हैं और पूजा कर कोरोनो से बचने की मन्नत मांग रहे हैं। मंदिर के पुजारी नंदलाल प्रसाद मेहता बताते हैं कि यहां रक्सैल बाबा की कृपा है, यहां कोरोना-वरोना नहीं आएगा। अभी गर्मी-ठंडा का सीजन है। लोग छत पर या घरों के बाहर सो रहे, इसलिए बीमार पड़ रहे।

महावीर महतो की मौत के बाद लोगों में गुस्सा
गांव के महावीर महतो की मौत तीन मई की रात को हो गई थी। पड़ोस में ही रहने वाले चंदू बैठा, लखन महतो और ठुरु महतो और कामेश्वर बैठा की मौत एक पखवाड़े के भीतर हुई है। महावरी महतो की पत्नी फुलवसिया बताती हैं कि टीका लगने के बाद रात में ही उन्हें बुखार हुआ, एक दिन बाद तबीयत और खराब हुई। फिर यह बिगड़ती ही चली गई। इलाज के लिए गढ़वा अस्पताल ले गए तो वहां जांच में कोरोना पॉजिटिव निकले थे।

पार्षद के पति संजय मेहता बताते हैं कि गांव में कई लोगों की मौत हुई। यहां के सभी लोगों ने बढ़चढ़ कर टीका लिया। टीका लेने के बाद जब लोग बीमार होने लगे तो इनका इलाज कोई नहीं कर रहा, अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं। हम लोग किसी तरह यहां के स्थानीय लोगों से इलाज करा रहे हैं। ऐसे में गांव के लोगों ने तय किया है कि जब तक इलाज की गारंटी नहीं मिलती, तब तक टीका नहीं लगवाएंगे।

हमारी बारी आई तो सब खराब हो गया?
संजय मेहता बताते हैं कि यहां लोग बीमार पड़ रहे हैं तो प्राइवेट अस्पताल में जाते हैं। सरकारी अस्पताल में जाने से डरते हैं। सरकारी अस्पताल में जाते हैं तो लाशें आती हैं। यहां शादी-ब्याह तो हो रहे हैं, लेकिन 5-10 मेहमानों को ही बुलाने की इजाजत है। यह ठीक नहीं है। जब चुनाव हो रहे थे, तब दो-दो लाख की भीड़ जुट रही थी, तब ठीक था? हमारी बारी आई तो सब खराब हो गया?

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