तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा बोलीं: राष्ट्रीय पार्टी का विचार पुराना हुआ, भाजपा को हराना है तो क्षेत्रीय दलों को साथ लड़ना होगा; लोकतंत्र अब राज्यों के जरिए ही अभिव्यक्त होगा


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नई दिल्ली13 मिनट पहलेलेखक: शोमा चौधरी

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तृणमूल पार्टी की सांसद महुआ मोइत्रा

एक राष्ट्रीय पार्टी का विचार अब खत्म हो चुका है। वो वक्त बीत चुका, जब राष्ट्रीय दल से लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर की पार्टी की जरूरत होती थी। अब क्षेत्रीय दलों को साथ आकर लड़ना चाहिए। यह कहना है तृणमूल पार्टी की सांसद महुआ मोइत्रा का। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प. बंगाल की सीएम ममता बनर्जी द्वारा देश की राजनीति को नया आकार देने और पार्टी की अल्पसंख्यक राजनीति के अलावा बंगाल चुनाव में जीत समेत कई मुद्दों पर मीडिया प्लेटफॉर्म इन्क्वॉयरी से विशेष चर्चा की। पढ़िए मुख्य अंश…

क्षेत्रीय दलों के बढ़ते महत्व पर

बंगाल चुनाव में हमने दिखा दिया है कि लहर कोई भी हो, अगर क्षेत्रीय दल अपनी बात जनता तक पहुंचा पाते हैं तो उन्हें जीतने से कोई नहीं रोक सकता। अब वो समय बीत चुका, जब राष्ट्रीय दल के विरोध में राष्ट्रीय दल ही खड़े हों। अब भाजपा को हराने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को एक होना होगा। अपने-अपने राज्यों में लड़ना होगा। यदि हम सोचते हैं कि कांग्रेस फिर से खड़ी होगी, 350 सीटें और हर राज्य में जीतेगी तो यह संभव नहीं है। पर जैसे बंगाल में टीएमसी, तमिलनाडु में एआईडीएमके और तीन-चार राज्यों में कांग्रेस की जो ताकत दिखी है, उससे स्पष्ट होता है कि हमें एक राष्ट्रीय दल की जरूरत नहीं रही है। यानी अब लोकतंत्र राज्यों के जरिए ही अभिव्यक्त होगा।
पार्टी छोड़कर जाने वालों पर

इसे मैं गलत नहीं मानती। भाजपा में जो लोग 30-40 वर्षों से हैं, उनका मैं सम्मान करती हूं। अलग-अलग विचारधारा जायज है। पर यह बात दुखी करती है कि लोग कहते हैं हम पूरी तरह एक विचारधारा को समर्पित हैं और अचानक पार्टी बदल लेते हैं। जैसे जितिन प्रसाद और ज्योतिरादित्य सिंधिया को ही लीजिए। मुकुल रॉय को अपनी गलती का अहसास हुआ, वे लौट आए। हमने उनका स्वागत किया। मैंने भी 10-11 साल पहले कांग्रेस छोड़ी थी। क्योंकि मैं बंगाल में जमीनी स्तर पर काम करना चाहती थी। जो वहां रहते हुए संभव नहीं था।

बंगाल में जीत पर

मुझे लगता है कि इस जीत के पीछे कई सारे कारण हैं। पार्टी में ऐसा नेता है जिसे किसी लहर की चिंता नहीं है। जो राज्य की जनता की भावनाओं को समग्र और व्यापक रूप से समझकर उन्हें प्रभावी रूप से चैनलाइज करता है। टीएमसी और उसके नेताओं ने यही किया। हम बंगाल के जरिए आइडिया ऑफ इंडिया बता पाए हैं। भले ही लोग टीएमसी के समर्थक नहीं हैं, ममता बनर्जी को पसंद नहीं करते। पर हम भाजपा को बाहर का रास्ता दिखाने में सफल रहे हैं। यही वक्त की जरूरत है। हमें हराने के लिए भाजपा ने पैसों से लेकर संसाधनों, मीडिया, चुनाव आयोग, केंद्रीय बलों को लगाना जैसे तरीके इस्तेमाल किए। पर हमने दमदारी से वापसी की। हमारी यह जीत बहुत मीठी और संपूर्ण है।

दीदी की सत्तावादी छवि

सभी जानते हैं कि ममता बनर्जी जमीनी स्तर की कार्यकर्ता हैं। पार्टी में सभी लोगों को आजादी है। उन्होंने कभी मुझे सलाह नहीं दी कि क्या करना है। क्या आपको लगता है कि मैं संसद में जो कहती हूं, वह ममता द्वारा सुझाया जाता है? ऐसा होता तो क्या सौगत रॉय और कल्याण बनर्जी पार्टी में रह पाते। हमें पूरी तरह आजादी है। जो किसी अन्य दल में नहीं है।
टीएमसी की अल्पसंख्यक नीति

टीएमसी संविधान में दिए गए धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के साथ खड़ी है जिसमें कहा गया है कि आप किसी भी धर्म को मान सकते हैं। ये आरोप पूरी तरह गलत हैं कि हम अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर ध्यान नहीं देते। ऐसा होता तो मुस्लिमों को क्यों भरोसा होता कि भाजपा के खिलाफ सिर्फ ममता ही खड़ी हो सकती हैं। उन्हें पता है कि दीदी उनके लिए लड़ रही हैं न सिर्फ बंगाल में, बल्कि संसद में भी।

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