नदी में सजी कफन की दुकान: मोक्ष पाने के लिए खतरे में डाला फल्गु नदी का वजूद, पतली धार बन गई 235 KM लंबी नदी, रोक के बावजूद रोज हो रहे 100 से अधिक शवदाह


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गया36 मिनट पहलेलेखक: दीपेश

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गया की पहचान फल्गु नदी से है। देश ही नहीं, दुनिया भर में। आज इसका वजूद ही खतरे में है। नगर निगम ने नदी क्षेत्र में शवदाह पर रोक का बोर्ड टांग रखा है, लेकिन एक-दो नहीं, बल्कि मोक्ष पाने के लिए हर रोज 100 से अधिक शवों को जलाया जाता है। कफन और लकड़ियों की दुकानें भी नदी में ही सज गई हैं। बिहार में 235 किलोमीटर कुल लंबाई वाली इस नदी की गया में स्थित यह है कि पूर्वी तट पर अभी सिर्फ पतली सी धारा बह रही है। गर्मी में यह भी सूख जाती है। नगर निगम प्रशासन ने श्मशान घाट पर जो बोर्ड लगा रखा है, उसमें साफ लिखा है- ‘शवों को नवनिर्मित शवदाह गृह में जलाएं। फल्गु नदी में शवदाह करना पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन है। ऐसा पाए जाने पर गया नगर निगम द्वारा कानूनी कार्रवाई की जाएगी।’ वस्तुस्थित यह है कि इस आदेश का पालन न तो करवाने वाला कोई है और न ही निगम की ओर से ध्यान दिया जा रहा है।

घाट के नीचे फल्गु नदी में सजी कफन और लकड़ी की दुकान।

घाट के नीचे फल्गु नदी में सजी कफन और लकड़ी की दुकान।

तमाम धार्मिक आयोजन भी यहीं करते हैं लोग
धार्मिक दृष्टिकोण से सनातन आस्था का प्रतीक फल्गु नदी का न केवल तेजी से अतिक्रमण हो रहा है, बल्कि नदी में ही कफन और लकड़ी की दुकानें खुल गई हैं। इस विश्व प्रसिद्ध नदी तट पर हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु तर्पण-अर्पण करने आते हैं। स्थानीय लोग तमाम धार्मिक आयोजन यहीं करते हैं। इसके बावजूद नदी के अस्तित्व पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यहां प्रत्येक दिन सुबह से लेकर रात 12 बजे तक करीब 100 शवों का दाह संस्कार किया जाता है। नगर निगम प्रशासन द्वारा प्रतिबंध के बाद भी लोग चिह्नित स्थल पर शव का दाह संस्कार नहीं कर नदी में ही करते हैं। यह पर्यावरण के लिए भी घातक है। नगर निगम आयुक्त सावन कुमार का कहना है कि प्रदूषणरहित शवदाह गृह का निर्माण कार्य तेजी से हो रहा है। बगल में शवदाह में लिए शेड बनाया गया है। इसके बावजूद लोग नदी में ही दाह संस्कार कर रहे हैं। प्रशासन के द्वारा कार्रवाई के साथ ही उन्हें समझाने की कोशिश की जाएगी।

विष्णुपद शमशान घाट ही क्यों?

गया के फल्गु नदी स्थित मोक्ष द्वार।

गया के फल्गु नदी स्थित मोक्ष द्वार।

गया के विष्णुपद शमशान घाट क्षेत्र को मोक्ष क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि इस जिले में मरने वाले लोगों के शव को दाह संस्कार के लिए दूसरे धार्मिक स्थल पर नहीं ले जाया जाता है। शवों को विष्णुपद शमशाान घाट या फिर जिले के जिस गांव और इलाके में मौत हुई है, वहीं के शमशान घाट में अंतिम संस्कार कर सकते हैं। दंतकथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के पांव के निशान पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। हिन्दू धर्म में इस मंदिर को अहम स्थान प्राप्त है। गया पितृदान के लिए भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुण्ठ की प्राप्ति होती है।

रात 12 बजे से सुबह 4 बजे तक नहीं जलाए जाते शव
रात को 12 बजे के बाद विष्णुपद के श्मशान घाट पर शवों का दाह संस्कार नहीं किया जाता है, क्योंकि यह सिद्ध पीठ है। यहां सुबह 4 बजे से ही दाह संस्कार का कर्म शुरू होता है। आचार्य सुबोध मिश्र ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार चार संध्या होती हैं, जिनमें तुरीय को चतुर्थ संध्या कहा जाता है। इस संध्या में शास्त्रों के अनुसार साधना, योग माया की साधना हो सकती है। लेकिन, दाह संस्कार नहीं हो सकता, क्योंकि यह एक हवन है, जिसकी वजह से यह वर्जित किया गया है। हवन में आहूति अपने प्रिय को ही दी जाती है, उसका मंत्र भी हवन से जुड़ा हुआ है, इसलिए तुरीय संध्या से लेकर ब्रह्म मुहूर्त तक दाह संस्कार वर्जित है।

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