नहीं रहे पर्यावरण गांधी: पेड़ों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन शुरू करने वाले सुंदरलाल बहुगुणा का निधन, कोरोना से संक्रमित थे


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ऋषिकेश12 मिनट पहले

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पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का कोरोना से संक्रमित होने के बाद एम्स ऋषिकेश में इलाज चल रहा था।

जाने माने पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का 94 साल की उम्र में निधन हो गया है। कोरोना संक्रमित होने के कारण उनका एम्स ऋषिकेश में इलाज चल रहा था। पिछले काफी समय से वे बीमार भी थे। शुक्रवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। वह पद्मविभूषण से सम्मानित थे। उन्होंने दुनिया भर में मशहूर हुए चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी। पेड़ों, जंगलों और पहाड़ों के लिए काम करने की वजह से उन्हें पर्यावरण गांधी कहा जाता था।

कोरोना संक्रमित होने के बाद बहुगुणा को 8 मई को एम्स में भर्ती किया गया था। वह डायबिटीज के पेशेंट थे और उन्हें कोरोना के साथ ही निमोनिया भी था। कई बीमारियों के कारण वे कई साल से नियमित दवाएं ले रहे थे। बिस्तर पर रहने के कारण उन्हें बेड सोर भी हो गया था। उनका ऑक्सीजन लेवल 86% पर था। 21 मई की दोपहर 12 बजकर 5 मिनट पर उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

मुख्यमंत्री रावत ने दुख जताया
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने सुंदर लाल बहुगुणा जी के निधन पर शोक जाहिर किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि चिपको आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बनाने वाले बहुगुणा जी का निधन न केवल उत्तराखंड और भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति है। सामाजिक सराकारों और पर्यावरण के क्षेत्र में आए इस खालीपन को कभी नहीं भरा जा सकेगा।

चिपको आंदोलन के प्रणेता थे
चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म नौ जनवरी सन 1927 को देवभूमि उत्तराखंड के मरोडा में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई के बाद वे लाहौर चले गए और वहीं से BA किया। सन् 1949 में मीराबेन और ठक्कर बाप्पा के संपर्क में आने के बाद बहुगुणा दलित वर्ग के विद्यार्थियों के लिए काम करने लगे। उनके लिए टिहरी में ठक्कर बाप्पा हॉस्टल बनवाया।

दलितों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने आंदोलन छेड़ दिया।पत्नी विमला नौटियाल की मदद से उन्होंने सिलयारा में ही पर्वतीय नवजीवन मंडल की स्थापना भी की।

शराब दुकानों के खिलाफ 16 दिन का अनशन किया
सन् 1971 में शराब की दुकानों को खोलने से रोकने के लिए सुंदरलाल बहुगुणा ने 16 दिन तक अनशन किया। चिपको आंदोलन के कारण वे दुनिया में वृक्षमित्र के नाम से मशहूर हो गए। उत्तराखंड में बड़े बांधों के विरोध में भी उन्होंने काफी समय तक आंदोलन किया।

बहुगुणा के काम से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में उन्हें पुरस्कृत किया था। इसके अलावा उन्हें कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

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