प. बंगाल में विधानसभा चुनाव: मुस्लिम वोट 105 सीटाें पर निर्णायक, तभी पलासी की जमीन पर फिर ‘जिंदा’ किया जा रहा ‘मीरजाफर’


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41 मिनट पहलेलेखक: कोलकाता से मधुरेश

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विधानसभा की कुल 294 सीटों में से करीब 105 सीटों पर मुस्लिम समाज के लोगों का वोट, निर्णायक है, ममता भाजपा के नाम पर मुस्लिम वोटराें को डरा रहीं है। (सिंबॉलिक फोटो)

यहीं देश का सबसे बड़ा धोखा हुआ था। 23 जून 1757 को पलासी की लड़ाई (वाजिब शब्द विश्वासघात) ने अगले 190 सालों तक भारत को, अंग्रेजों का गुलाम बना दिया। बीते 263 साल में सबकुछ बदल चुका है। लड़ाई के मैदान में मुहल्ला बस गया, खेती होती है। यहां खड़ा अंग्रेजों का विजय स्तंभ मुर्दा सा है। ठीक बगल में चाय की छोटी दुकान और पीडब्ल्यूडी का लोकल गेस्ट हाउस। लेकिन, मीरजाफर ‘जिंदा’ है। वह बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति था, जिसने लोभ में आकर देश को अंग्रेजों को बेच दिया।

धोखेबाजी के इस प्रतीक को इस चुनाव में खूब ‘जिंदा’ किया गया है। ज्यादातर, मुसलमानों के वोट के मामले में पूछा जा रहा है-’अबकी मीरजाफर कौन होगा?’ यह सवाल नेताओं के खुले मंच का है और पब्लिक की जेहन का भी। दरअसल, यहां 30% से ज्यादा मुसलमान हैं। ये सरकार बनाने के सबसे खास किरदार रहे हैं। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, फिर ममता बनर्जी की सरकार इसकी गवाही है। विधानसभा की कुल 294 सीटों में से करीब 105 सीटों पर इनका वोट, निर्णायक है।

उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद, मालदा तथा दक्षिण 24 परगना जिलों में इन वोटरों की संख्या 40% से ज्यादा बताई जाती है। मुर्शिदाबाद में लगभग 70% और मालदा में मुस्लिम वोटरों की संख्या 57% है। ये जिले बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। खासकर ममता बनर्जी को, मीरजाफर इसलिए ज्यादा याद है कि धोखेबाजी/लंगड़ीमारी की बनाई गई पुरजोर गुंजाइश, कहीं उनका भी राजपाट न छीन ले। ममता के लिए इस खतरे की संभावना या आशंका मुस्लिम वोट से जुड़ी है, जिसे उन्होंने बड़ी मशक्कत व तमाम बदनामियों को सहते हुए अपना बनाया।

ममता की तबाही इन वोटों के छिटकने, टूटने की मात्रा पर निर्भर है। कम्युनिस्टों, कांग्रेसियों को ऐसा करने की ताकत अब्बास सिद्दीकी में दिखी, उनको अपने साथ कर लिया। अब्बास सिद्दीकी, फुरफुराशरीफ के पीरजादा हैं। उनका इंडियन सेक्युलर फ्रंट है। फुरफुराशरीफ (हुगली), मुसलमानों का खास जियारत स्थल है। दावा है कि दक्षिण बंगाल की करीब सवा दो हजार से ज्यादा मस्जिदों पर उसका सीधा प्रभाव है।

आगे, देखने वाली बात होगी कि यह प्रभाव, वोट के मामले में कितना असरदार रहा? लेकिन, जो अभी दिख रहा है, वह बहुत मायनों में ममता विरोधियों को इस मोर्चे पर मायूस करने वाला है। कम्युनिस्ट फ्रंट ने अब्बास सिद्दीकी को 30 और कांग्रेस ने 7 सीटें दीं। बाद में कांग्रेस ने इन सभी 7 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। यह फ्रंट 30 में से सिर्फ 26 सीट पर लड़ रहा है। 25 उम्मीदवार घोषित कर दिए।

यह पूरा गठबंधन, दोस्ताना संघर्ष के बीच किसी तरह निभ रहा है। ममता ने बयालीस तथा भाजपा ने नौ मुसलमानों को टिकट दिया है। भाजपा ने अपने इस सबसे बड़े मोर्चे को फतह करने या इसके बूते दूसरे तरीकों (प्रतिक्रिया में हिंदू गोलबंदी) से फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ममता के मुस्लिम तुष्टीकरण से जुड़े तमाम कारनामों के हवाले उनको हिंदू विरोधी बताने की बातें, बुलंदी धरी हुई हैं। जवाब में ममता अपने को हिंदू, और अपने हिंदू पक्षी काम गिना रहीं।

मुस्लिम वोट के लिए ओवैसी आए, अब तक प्रत्याशी ही नहीं उतारे

मुसलमान वोटरों को तोड़ने का एक और खतरा असदउद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी एआईएमआईएम भी है। ओवैसी बंगाल आए और चुनाव लड़ने की बात कही। लेकिन अब तक अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किए। खबर है कि अगले तीन-चार दिनों में उनकी मीटिंग होगी, वे अपनी सीटें बताएंगे। इस खानापूर्ति का मतलब समझा जा सकता है। उनका बंगाल अध्यक्ष, ममता के साथ है। औवैसी का यहां कुछ खास प्रभाव नहीं दिख रहा। ममता, ओवैसी को भी ‘मीरजाफर’ कहती हैं; भाजपा का ‘दुलरुआ-पोसुआ’ बताती हैं।

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