फादर्स डे स्पेशल… काशी की सुमेधा की कहानी: रीढ़ की हड्डी में इंफेक्शन से बेटी के शरीर का निचला हिस्सा सुन्न पड़ गया था, पिता ने दी नई जिंदगी; PM मोदी भी हुए थे प्रभावित


वाराणसी5 मिनट पहले

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अपने पापा बृजेश चंद्र पाठक की गोद में सुमेधा।

वाराणसी के मानस नगर की सुमेधा पाठक साल 2013 में कक्षा 10 में पढ़ती थी। इसी बीच उनकी रीढ़ की हड्‌डी में इंफेक्शन हुआ और कमर के नीचे का शरीर का हिस्सा शून्य हो गया। दवा और उपचार का लंबा सिलसिला चला लेकिन सुमेधा आज भी वीलचेयर पर हैं। सुमेधा कहती हैं कि उन दिनों ऐसा लगता था जैसे कि अब जिंदगी में कुछ बाकी ही नहीं रहा। तब मेरे पापा ने सिखाया कि जिंदगी की शुरुआत नए सिरे से कैसे करनी है।

पापा की प्रेरणा की बदौलत ही 2016 में इंटरमीडिएट में कॉमर्स सब्जेक्ट ग्रु्प से सीबीएसई की दिव्यांग वर्ग की नेशनल टॉपर रहीं। इसके बाद वह वीलचेयर पर ही बैठकर घर में अपने पापा द्वारा बनाए गए 12 मीटर के शूटिंग रेंज में प्रैक्टिस कर स्टेट और नेशनल चैंपियनशिप में अपनी प्रतिभा का परचम लहराया। सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाली सुमेधा अब ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अकाउंटिंग से संबंधित तैयारी कर रही हैं।

सुमेधा ने पुलवामा में आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों के परिजनों की मदद के लिए 21 हजार रुपए का चेक रिलीफ फंड में दिया था। राहत का चेक सुमेधा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद सौंपा था। तब प्रधानमंत्री ने सुमेधा से वादा किया था कि वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का शूटिंग रेंज बनवाएंगे।

सुमेधा ने पुलवामा में आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों के परिजनों की मदद के लिए 21 हजार रुपए का चेक रिलीफ फंड में दिया था। राहत का चेक सुमेधा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद सौंपा था। तब प्रधानमंत्री ने सुमेधा से वादा किया था कि वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का शूटिंग रेंज बनवाएंगे।

पिता बोले- सुमेधा आज भी मेरे लिए छह माह की बच्ची जैसी

दवा व्यवसायी बृजेश चंद्र पाठक ने बताया कि उनकी बेटी पेराप्लेजिक बीमारी से पीड़ित हुई। इस बीमारी में कमर के नीचे एहसास ही नहीं होता कि शरीर का वह हिस्सा है भी या नहीं है। ऐसी स्थिति में नित्यक्रिया के लिए भी दूसरों पर ही आश्रित रहना पड़ता है और बेहद खास सतर्कता बरतनी होती है। शरीर से समय से यूरिन बाहर न निकले तो इंफेक्शन हो सकता है। हमने बेटी को समझाया कि तू मेरे लिए जैसे छह माह की थी वैसे ही अब भी है। शुरुआती दौर में आठ से नौ घंटे तक उसकी फिजियोथेरेपी करानी पड़ती थी। फिर यह सिलसिला चार से पांच घंटे पर आकर थमा।

बिटिया को हमने समझाया कि जिंदगी संघर्ष का दूसरा नाम है। मैं तुम्हारे साथ हूं और तुम अब अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लो। अब धीरे-धीरे आठ साल हो गए। सुमेधा को रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार मिला, उससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिले। उसने शूटिंग चैंपियनशिप में नाम कमाया। वह सामाजिक कार्यों के साथ ही बड़े कार्यक्रमों का संचालन करती है और मोटिवेशनल स्पीच देती है। आज पूरे बनारस में लोग मुझे सुमेधा पाठक के पिता के नाम से जानते हैं। इससे ज्यादा अब इस जीवन में क्या चाहिए।

बृजेश पाठक ने बताया कि मेरी बेटी में एक और खास बात है, उसने आज तक दिव्यांगों को मिलने वाली किसी सरकारी सुविधा का लाभ नहीं लिया। वह सब कुछ अपनी मेधा और मेहनत के दम पर कर रही है।

सुमेध कहती हैं कि कहा जाता है कि हम अपने मां-बाप का ऋण कभी नहीं उतार सकते क्योंकि उन्होंने हमें जन्म दिया है। मगर, हमारे पापा ने तो हमें नया जीवन देने के साथ ही मुश्किल हालात में कैसे जीना है, यह भी सिखाया है।

सुमेध कहती हैं कि कहा जाता है कि हम अपने मां-बाप का ऋण कभी नहीं उतार सकते क्योंकि उन्होंने हमें जन्म दिया है। मगर, हमारे पापा ने तो हमें नया जीवन देने के साथ ही मुश्किल हालात में कैसे जीना है, यह भी सिखाया है।

पापा मेरी लाइफलाइन हैं, उन्होंने मेरे लिए बहुत त्याग किया

सुमेधा कहती हैं कि आज जो भी नाम और पहचान मिली हुई है, वह सब मेरे पापा की बदौलत है। मेरे पापा मेरी लाइफलाइन हैं। उन्होंने मेरे लिए बहुत त्याग किया। अपने काम, दोस्तों और सोशल सर्किल सब पर मुझे प्राथमिकता दी। जितना समय वह मेरी देखरेख में व्यतीत करते हैं उतने में वह अपने व्यवसाय को न जाने कहां से कहां पहुंचा सकते थे। वह आज भी रोजाना मुझे मोटीवेट करते रहते हैं और कहते हैं रुक जाना नहीं तू हार के…। कहा जाता है कि हम अपने मां-बाप का ऋण कभी नहीं उतार सकते क्योंकि उन्होंने हमें जन्म दिया है। मगर, हमारे पापा ने तो हमें नया जीवन देने के साथ ही मुश्किल हालात में कैसे जीना है, यह भी सिखाया है।

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