बारिश बनी मुसीबत: छत्तीसगढ़ के खुखरापाठ में कंधे पर मरीज को रखकर कराते हैं नाला पार, तब एंबुलेंस से ले जा पाते हैं अस्पताल


जशपुरनगर4 घंटे पहले

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मरीज को कंधे पर ढोकर नाला पार कराते परिजन।

  • प्रशासन का दावा मनोरा में कोई गांव पहुंच विहीन नहीं
  • बारिश के दिनों में पहुंचविहीन हो जाता है ग्राम खुखरापाठ, सोमवार को बीमार महिला को अस्पताल तक पहुंचाने घंटों खड़ी रही एम्बुलेंस

मनोरा ब्लॉक में कई ऐसे आश्रित गांव हैं जहां बरसात के दिनों में सड़क के अभाव में पहुंचना मुश्किल होता है। ऐसी स्थिति में गांव में जब कोई बीमार पड़ता है तो उसे कंधे पर ढोकर गांव से बाहर निकाला जाता है। तब जाकर मरीज अस्पताल पहुंच पाता है। अभी शुरुआती बरसात में ही जिले में ऐसी तस्वीरें सामने आने लगी हैं। इधर प्रशासन का दावा कुछ और ही है। अधिकारियों के मुताबिक मनोरा ब्लॉक में एक भी ऐसा गांव नहीं जो बरसात में पहुंचविहीन हो जाए।

मनोरा ब्लॉक के खुखरापाठ में एक बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए लेेने पहुंची संजीवनी 108 की टीम को आधे घंटे तक मरीज के एंबुलेंस तक पहुंचने का इंतजार करना पड़ा। संजीवनी कर्मचारियों ने बताया कि मनोरा ब्लॉक के खुखरापाठ में 102 में कॉल आया था कि वहां की एक महिला सलिना केरकेट्टा की तबीयत ज्यादा खराब है। कॉल पर एंबुलेंस की टीम खुखरापाठ के लिए रवाना हुई। कच्ची सड़क पर कुछ दूर चलने के बाद नाले पर पुल नहीं होने से संजीवनी की टीम खुखरापाठ तक नहीं पहुंच पाई। कर्मचारियों ने परिजन को फोन कर नाले को पार करने कहा।

नाला पार करने के बाद ऐसे मरीज को ले जाते हैं हॉस्पिटल

नाला पार करने के बाद ऐसे मरीज को ले जाते हैं हॉस्पिटल

बाइक एम्बुलेंस तक चलने के लिए सड़क नहीं
मनोरा व बगीचा ब्लॉक के पहाड़ी इलाकों में कई ऐसी बस्तियां हैं जहां सड़क व पुल के अभाव में बरसात के दिनों में वाहनों का आना-जाना बंद हो जाता है। सुदूर गांव ऐसे हैं जहां तक बाइक एंबुलेंस तक नहीं पहुंच पाती है। पहुंचविहीन गांव तक पहुंचने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने जिला खनिज एवं न्यास निधि से दो बाइक एंबुलेंस खरीदने की प्लानिंग की थी, पर जब दूरस्थ गांव के बरसाती सड़कों को देखा गया तो पता चला कि यह गांव ऐसे हैं जहां बाइक एबुलेंस तक नहीं पहुंच पाएंगे, इसलिए स्वास्थ्य विभाग ने बाइक एंबुलेंस की खरीदी नहीं की।

औपचारिकता निभाने के लिए मेडिकल कैंप दो ही गांव में लगा रहे
करीब 15 साल पहले अति पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवाओं की मौत फूड पॉइजनिंग के कारण हुई थी। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा बगीचा विकासखंड केधनापाठ व एक अन्य गांव में मेडिकल कैंप लगाया जाता है। हर साल बरसात के दिनों में यह कैंप सिर्फ दो गांव में परंपरा के तौर पर लगाया जा रहा है। इसके अलावा अन्य कई पहुंचविहीन गांव हैं, जहां मितानिन को दवाएं देकर छोड़ दिया जाता है।

बरसात में सबसे ज्यादा मेडिकल इमरजेंसी
एक ओर बरसात में गांव तक पहुंचना मुश्किल होता है वहीं दूसरी ओर बरसात के दिनों में ही सबसे ज्यादा मेडिकल एमरजेंसी की जरूरत पड़ती है। गांव में दूषित पानी पीने की वजह से लोग उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों की चपेट में आते हैं। इसके अलावा बरसात में ग्रामीणों का खानपान भी जोखिमभरा होता है। ग्रामीण जंगल में निकलने वाले जंगली मशरूम, पुटू, पके हुए कटहल आदि का सेवन करते हैं। कई बार जंगली मशरूम की सही पहचान नहीं होने की वजह से ग्रामीण फूड पॉइजनिंग के शिकार हो जाते हैं।

मनोरा ब्लाक में एक भी गांव पहुंचविहीन नहीं है
मनोरा ब्लॉक के ग्राम पंचायत व राजस्व ग्राम में एक भी ऐसा नहीं है जो बरसात के दिनों में पहुंचविहीन हो जाए। हर गांव तक पहुंचने के लिए सड़क व पुल बन चुकी है। खुखरापाठ 15 से 20 परिवार की बस्ती है। वहां स्कूल है और कच्ची सड़क बनी हुई है। खेत वाला एक नाला है पर उसे पार किया जा सकता है।”
अनिल तिवारी, सीईओ, जपं मनोरा।

बाइक एंबुलेंस के लिए भी सड़क चाहिए
बाइक एंबुलेंस खरीदने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। पर बाइक एंबुलेंस के लिए भी सड़क चाहिए। यह एंबुलेंस चारपहिया वाहन के जितनी जगह लेगी और पहाड़ी इलाकों के कई गांव ऐसे हैं जहां बाइक तो जा सकती है पर चारपहिया वाहन नहीं। इसे देखते हुए बाइक एंबुलेंस नहीं खरीदा गया। साथ ही जिस तरह की एंबुलेंस चाहिए थी वैसा नहीं मिल पा रहा था।”
डॉ पी सुथार, सीएमएचओ

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