बिहार के 12 शिवलिंग की कहानी: छह की कथाएं राम के विवाह, राज्याभिषेक और लंका विजय से जुड़ीं, एक शिवलिंग उन्होंने खुद स्थापित किया


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बिहार4 मिनट पहले

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हरिहरनाथ मंदिर, सोनपुर में शिवलिंग के आधे भाग में शिव, शेष में विष्णु भगवान की प्रतिमा है।

  • महाशिवरात्रि के 3 महात्म्य, शिव-पार्वती विवाह शिवलिंग रूप में प्रकटीकरण और विषपान कर सृष्टि की रक्षा

बिहार में पौराणिकता के आधार पर धर्माचार्यों द्वारा चुने गए 12 शिव मंदिरों में 6 की कथा राम के विवाह, राज्याभिषेक व लंका विजय से जुड़ी है। बाढ़ के उमानाथ मंदिर की स्थापना की कथा है कि राम गुरु विश्वामित्र के साथ अयोध्या से जनकपुर जा रहे थे। तब यहां उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर उन्होंने शिव की उपासना की थी। इसी दौरान उन्होंने सोनपुर के हरिहरनाथ में हरि और हर की स्थापना की।

सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ में राज्याभिषेक के बाद सपरिवार तीर्थाटन करने आए थे। यहीं से जल लेकर बाबाधाम गए थे। लखीसराय के अशोकधाम में उन्होंने खुद शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी। लंका विजय के बाद खुसरुपुर के गौरीशंकर मंदिर पहुंचे थे। मां सीता के साथ अरेराज के सोमेश्वरनाथ भी गए।

सिंहेश्वर स्थान, मधेपुरा

जो शृंगी ऋषि के ईश्वर हैं, वही शिव, वही सिंहेश्वर

जो शृंगी ऋषि के ईश्वर हैं, वही शिव, वही सिंहेश्वर

शृंगेश्वर अर्थात शृंगी ऋषि के ईश्वर भगवान शिव। सिंहेश्वर स्थान में मनोकामना लिंग के रूप में तीन भागों में विभक्त हैं। यहां के पंडे-पुजारी कहते हैं कि यहां का शिवलिंग हिरण के सींग के तीन टुकड़े से बना है। सबसे प्रबल साक्ष्य रामायण काल में ऋष्य शृंग आश्रम व महाभारत में चम्पारण्य तीर्थ से है। शृंगी ऋषि ने ही दशरथ को पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था और उसी ऋषि शृंगी के इष्ट महादेव हैं। कालांतर में शिवलिंग की गढ़ी उठाने के लिए खुदाई की गई थी। देखा गया कि शिवलिंग एक चट्टान से जुड़ा है। खुदाई बंद कर दी गई। वर्तमान में मंदिर की व्यवस्था सिंहेश्वर मंदिर न्यास समिति करती है।

गुप्ता धाम, चेनारी, रोहतास

भस्मासुर से बचने को शिव ने इसी गुफा में ली शरण।

भस्मासुर से बचने को शिव ने इसी गुफा में ली शरण।

भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव ने जिस गुफा में शरण ली, आज वही गुप्ता धाम है। यहां गुफा में ठोस चूना पत्थर का प्राकृतिक शिवलिंग है। धाम जाने का रास्ता काफी दुर्गम है। अंदर अलग-अलग सभागार, नाचघर, घुड़दौड़ के नाम से मशहूर गुफाएं हैं। कहा जाता है कि प्रवास के दौरान भगवान शिव ने इनका निर्माण किया। बिहार में एकमात्र मंदिर, जहां आम आदमी के अलावा अपराधी भी जलाभिषेक करने आते हैं और मंदिर के आसपास के इलाके में अपराध भी नहीं करते। मुख्य महंत बलि गिरि बताते हैं कि धाम की असली संपत्ति दान में मिली 40 गायें हैं जिनके दूध से शिव का रोज अभिषेक होता है।

गरीबनाथ धाम, मुजफ्फरपुर

स्वयंभू शिवलिंग, सपरिवार विराजते हैं बाबा भोलेनाथ।

स्वयंभू शिवलिंग, सपरिवार विराजते हैं बाबा भोलेनाथ।

बाबा गरीब नाथ मनोकामना पूर्ण करने वाले व स्वयंभू शिवलिंग हैं। धाम का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। साक्ष्यों के आधार 300 साल से अधिक का तो है ही। 1812 तक इस स्थान पर छोटे मंदिर में बाबा की पूजा होती थी। उस समय शिवदत्त राय ने सात धूर के भूखंड पर पहला मंदिर बनवाया। 1944 में ढाई कट्ठा जमीन देकर चाचान परिवार ने मंदिर का नवीनीकरण कराया। 2006 में डेढ कट्ठा जमीन और दी तो भव्य परिसर बना। बाबा भोलेनाथ पूरे परिवार के साथ यहां विराजते हैं। प्रधान पुजारी पं. विनय पाठक बताते हैं कि हर साल 15 लाख से अधिक श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं।

अजगैबीनाथ मंदिर, सुल्तानगंज

कांवर लेकर देवघर गए थे भगवान राम।

कांवर लेकर देवघर गए थे भगवान राम।

मंदिर उत्तरवाहिनी गंगा के बीच पहाड़ी पर है। मंदिर की स्थापना के पूर्व इसे जहनुगिरि कहते थे। जहनु ऋषि का आश्रम यहीं था। आनंद रामायण के अनुसार यहां विलवेश्वर शिव का पवित्र धाम था। शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग की स्थापना राजा शशांक ने की थी। 15वीं सदी आते शिवलिंग छिप गया था। ऋषि हरनाथ भारती को उनकी तपस्या स्थली में मृगचर्म के नीचे मिला। मंदिर पर स्वर्ण कलश है। सामने ढाई मन का घंटा है। मंदिर का विश्लेषण डॉ. अभयकांत चौधरी की पुस्तक ‘सुल्तानगंज की संस्कृति’ में है। अज एक संस्कृत शब्द है और शिव का नाम है। गैब का अर्थ है-परोक्ष। अर्थात जो सामने न हो। महंत प्रेमानंद गिरि बताते हैं कि त्रेता युग में राम ने यहां से देवघर तक की कांवर यात्रा की और जलाभिषेक किया था।

अशोक धाम, लखीसराय

बगैर लग्न-मुहूर्त शादियां व मुंडन संस्कार।

बगैर लग्न-मुहूर्त शादियां व मुंडन संस्कार।

एनएच किनारे इंद्रदमनेश्वर मंदिर, अशोकधाम का शिवलिंग काफी प्राचीन है। इसे मनोकामना शिवलिंग है। इतिहास त्रेता युग से जुड़ा है। मान्यता है कि यहां हर मनोकामना पूरी होती है। सावन में श्रद्धालु सिमरिया गंगा घाट से जल भर कर तीस किमी पैदल चलकर यहां जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि पर मंदिर परिसर से लखीसराय अष्टघटी तालाब स्थित पार्वती मंदिर तक बारात निकलती है। मंदिर के मुख्य पुरोहित पंडित कमल नयन पांडेय बताते हैं कि शृंगी ऋषि आश्रम से ज्येष्ठ बहन शांता के जाने के क्रम में किल्लवी (किऊल) एवं गंगा के संगम तट पर श्रीराम ने खुद शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी। अशोक धाम ऐसा धाम है, जहां शादी-विवाह से लेकर मुंडन संस्कार तक बगैर किसी लग्न-मुहूर्त के संपन्न होते हैं।

हरिहरनाथ मंदिर, सोनपुर

शिवलिंग के आधे भाग में शिव, शेष में विष्णु।

शिवलिंग के आधे भाग में शिव, शेष में विष्णु।

यहां का शिवलिंग इकलौता है जिसके आधे भाग में शिव (हर) और शेष में विष्णु (हरि) की आकृति है। मान्यता है कि इसकी स्थापना ब्रह्मा ने शैव और वैष्णव संप्रदाय को एक-दूसरे के नजदीक लाने के लिए की थी। गज-ग्राह की पुराणकथा भी प्रमाण है। एक तथ्य यह भी है कि इसी स्थल पर लंबे संघर्ष के बाद शैव व वैष्णव मतावलंबियों का संघर्ष विराम हुआ था। कथा के अनुसार राम ने गुरु विश्वामित्र के साथ जनकपुर जाने के दौरान यहां रूक कर हरि और हर की स्थापना की थी। उनके चरण चिह्न हाजीपुर स्थित रामचौरा में मौजूद हैं। मुख्य पुजारी सुशील चंद्र शास्त्री के अनुसार इस क्षेत्र में शैव, वैष्णव और शाक्त संप्रदाय के लोग एक साथ कार्तिक पूर्णिमा का स्नान और जलाभिषेक करते हैं। 1757 के पहले मंदिर इमारती लकड़ियों और काले पत्थरों के शिला खंडों से बना था। पुनर्निर्माण मीरकासिम ने करवाया था।

सोमेश्वरनाथ मंदिर, अरेराज

| इकलौता मंदिर जहां शैव, शाक्त व वैष्णव अलग करते हैं जलाभिषेक।

| इकलौता मंदिर जहां शैव, शाक्त व वैष्णव अलग करते हैं जलाभिषेक।

मोतिहारी जिला मुख्यालय से 29 किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम के कोने पर नारायणी के पार्श्व में अवस्थित है अरण्यराज, जिसे अरेराज के नाम से जाना जाता है। स्कन्दपुराण, नेपाल महात्म्य, रोटक व्रतकथा, तीर्थराज अरेराज, अरेराज धाम आदि पुस्तकों में इस स्थल का उल्लेख है। मंदिर रामायणकालीन है। साढ़े सात फीट गह्वर में भगवान सोम द्वारा स्थापित पंचमुखी शिवलिंग है। शास्त्रों में शिव के पांच अवतारों की परिकल्पना की गई है। एक-एक मुख एक-एक अवतार का प्रतीक है। मान्यता है कि चन्द्रमा/सोम ने पाप और शाप से मुक्ति व सुख-शांति के लिए सोमेश्वरनाथ की आराधना की थी।

भारत का यह अकेला मंदिर है जहां मन्नत पूरी होने पर आंचल की खूंट पर लोकनर्तक से महिलाएं नृत्य कराकर नृत्यसंगीत के आदि देवता देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने का प्रयास करती हैं। चावल के आटे का शुद्ध घी में यहां नैवेद्य के रूप में रोट चढ़ाने की प्रथा है। ऐसी मान्यता है कि जो गृहिणी ऐसा करती हैं, अन्नपूर्णा की साक्षात मूर्ति मां पार्वती अत्यंत प्रसन्न होती है। महंत रविशंकर गिरि बताते हैं कि यहां तीन परंपरा के श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं। बसंत पंचमी में शाक्त सम्प्रदाय, महाशिवरात्रि व श्रावण मास में शैव सम्प्रदाय व अनंत चतुर्दशी में वैष्णव सम्प्रदाय के लोग पूजा व अभिषेक करते हैं। दुनिया में यह परंपरा केवल यहीं है। यहां भगवान राम ने माता जानकी के साथ महाशिवरात्रि के दिन अभिषेक व पूजन किया था।

गौरीशंकर मंदिर, खुसरूपुर​​​​​​​

भगवान शंकर-मां पार्वती युक्त है शिवलिंग, इसमें 1200 छोटे रुद्र।

भगवान शंकर-मां पार्वती युक्त है शिवलिंग, इसमें 1200 छोटे रुद्र।

सबसे अहम इस मंदिर का शिवलिंग है जो भगवान शंकर और माता पार्वती युक्त है। इसी वजह से इसे गौरीशंकर मंदिर कहा जाता है। शिवलिंग में 1200 छोटे रुद्र (शिवलिंग) हैं। पौराणिक कथा के अनुसार आज का बैकटपुर बैकुंठ धाम था। इसी वन में जरा नाम की राक्षसी रहती थी। मगध सम्राट जरासंध की उत्पत्ति की किवदंती यहीं से जुड़ी है। जरासंध शिव के भक्त थे। मंदिर का जो वर्तमान स्वरूप है, वह मुगल सेनापति राजा मान सिंह द्वारा निर्मित है। मंदिर प्रबंधन बिहार राज्य धार्मिक न्यास के जिम्मे है।

उमानाथ शिव मंदिर, बाढ़

बिहार के काशी के रूप में ख्यात, अंकुरित स्वरूप में शिव हैं मौजूद।

बिहार के काशी के रूप में ख्यात, अंकुरित स्वरूप में शिव हैं मौजूद।

उत्तरवाहिनी गंगा तट पर स्थित शिवमंदिर देश में गिने-चुने ही हैं। उमानाथ उनमें एक है। गंगा का प्रवाह कुछ ही स्थलों पर उत्तरागामी है। पुजारी अजय पांडे ने बताया कि इनमें बनारस, उमानाथ और अजगैबीनाथ हैं। यही वजह है कि उमानाथ को काशी के समान माना जाता है। किवदंती है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व शिवलिंग को उखाड़ मंदिर के बीच स्थापित करने के लिए खुदाई की गई। जैसे-जैसे गहरी होती गई, शिवलिंग का धरती के अंदर आकार लंबा होता गया। इसी वजह से इसे अंकुरित महादेव कहा जाता है। ​​​​​​​

बूढ़ानाथ मंदिर, भागलपुर​​​​​​​

यहां भोलेनाथ का है वृद्ध रूप।

यहां भोलेनाथ का है वृद्ध रूप।

गंगा के दक्षिणी तट पर 50 एकड़ में फैला मंदिर काफी समृद्ध है। बक्सर से ताड़का सुर का वध करने के बाद वशिष्ठ मुनि शिष्य के साथ भागलपुर पहुंचे और शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की। मंदिर के महंत शिवनारायण गिरि महाराज बताते हैं कि यहां शिव की जटा से निकली गंगा हर साल शिव व पार्वती के चरण पखारते गुजरती है। उत्तरवाहिनी गंगा के गुजरने से इसका आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है। कहा जाता है कि शंकर भगवान का वृद्ध रूप यहां स्थापित है। इसलिए इसे बाबा बूढ़ानाथ कहा जाता है। मंदिर ट्रस्ट के पास रखे ताम्रपत्र पर लिखे श्लोक में मंदिर की स्थापना का उल्लेख है।

बाबा सिद्धेश्वरनाथ, जहानाबाद​​​​​​​​​​​​​​

सिद्ध संप्रदाय ने शुरू की पूजा।

सिद्ध संप्रदाय ने शुरू की पूजा।

बाणावर पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर व गुफाओं के बारे में धार्मिक मामलों के जानकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने बताया कि शैवधर्म में सिद्ध संप्रदाय ने शिवलिंग पूजन की प्रथा जहानाबाद के मखदुमपुर प्रखंड में स्थित बराबर पर्वत समूह की सूर्यांक गिरि की चोटी पर सिद्धेश्वर नाथ की स्थापना कर शुरू की। महाभारत के वन पर्व में सिद्धेश्वर नाथ को बानेश्चर शिव लिंग कहा गया है। मंदिर का निर्माण छठी शताब्दी में किया गया। सावन माह की अनंत चतुर्दशी को पातालगंगा के जल में स्नान कर भक्त सिद्धेश्वर नाथ पर जलाभिषेक कर मनोवांछित फल की कामना करते हैं।

ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर, ब्रह्मपुर

मंदिर बनवा दोषमुक्त हुए ब्रह्मा।

मंदिर बनवा दोषमुक्त हुए ब्रह्मा।

शिव महापुराण में यह शिवलिंग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला है। मंदिर के पुजारी उमलेश जी महाराज कहते हैं कि जब ब्रह्मा को पुरुषोत्तम भगवान से सृष्टि रचना का आदेश मिला तब उन्होंने ब्रह्मपुर को अध्यात्म की धुरी माना। कुंवर सिंह विवि के पूर्व कुलपति डॉ. धर्मेंद्र तिवारी बताते हैं कि एक बार ब्रह्मा ने अपने तीन मुखों से शिव को प्रणाम किया। तो विष्णु ने कहा कि यह हमारे आराध्य का अपमान है। पाप है। पापमुक्ति के लिए ब्रह्मा ने यहां पहुंच विश्वकर्मा से आग्रह कर शिवगंगा (ब्रह्मसरोवर) और षट्कोणीय शिव मंदिर बनवाया। खुद शिवलिंग बना आराधना की। तब दोषमुक्त हुए।

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