बीरेन सरकार के 4 साल: उग्रवाद और बंद के लिए बदनाम रहे मणिपुर की छवि बदलने में कामयाब रही बीरेन सरकार, राज्य को अब टूरिस्ट का इंतजार


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एक घंटा पहलेलेखक: अविनाश द्विवेदी

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साल 2015 तक मणिपुर की पहचान यह थी कि देश में सबसे ज्यादा हिंसा की घटनाएं यहीं होती थीं। बड़ी मात्रा में युवाओं को ड्रग्स की लत थी और बड़ी संख्या में एड्स से पीड़ित लोग इस राज्य में थे। जिन लोगों को एड्स था, उनमें से आधे को यह इंफेक्शन एक ही सुई से ड्रग्स लेने के चलते हुआ था। लेकिन अब मणिपुर की छवि बदल रही है। इस बदलाव का जरिया बन रही है, यहां की बीरेन सरकार। हिंसा में कमी, ड्रग्स पर लगाम जैसी बड़ी उपलब्धियों को सेलिब्रेट करने के लिए बीरेन सरकार ने 15 मार्च, 2021 को सरकार की चौथी सालगिरह पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया।

म्यांमार बॉर्डर से सटे मणिपुर को जवाहरलाल नेहरू ‘भारत की मणि’ कहते थे, लेकिन चार साल पहले यहां शाम के साढ़े पांच बजते ही कर्फ्यू जैसी शांति हो जाती थी। उग्रवादियों का डर इस शांति की बड़ी वजह था। लेकिन अब स्थानीय और पर्यटक रात में इम्फाल के नजारे ले सकते हैं। किसी आम भारतीय को ‘नाइट लाइफ’ एक साधारण बात लग सकती है लेकिन इम्फाल के लोगों के लिए यह बहुत बड़ी बात है।

बीते चार सालों में मणिपुर में हिंसा कमी आई है और सुरक्षा के इंतजाम बेहतर हुए हैं। अब इम्फाल में शाम 7-8 बजे तक दुकानें खुली मिल जाती हैं। इम्फाल के कई हिस्सों में 7-8 बजे के बाद भी खाने-पीने की रोड-साइड दुकानें और रेस्टोरेंट भी खुले मिल जाते हैं। नाइट लाइफ के इस नये कल्चर को सेलिब्रेट करने के लिए CM बीरेन सिंह ने हाल ही में इम्फाल के चेराओचिंग में ‘इम्फाल व्यू टावर’ की शुरुआत की है। जहां से पूरा इम्फाल दिखता है।

उग्रवादी घटनाओं में आम लोगों की मौत में 99% तक कमी आई
कुछ साल पहले तक मणिपुर, उग्रवादी हिंसा, बम धमाकों और बंद के चलते खबरों में रहता था। पिछले कुछ सालों में वहां से ऐसी खबरें आनी कम हो गई हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर में 2016 में उग्रवाद से जुड़ी 233 घटनाएं हुई थीं, जो 2017 में 167 हो गई थीं और 2018 में घटकर 127 हो गई थीं। इसके बाद भी लगातार ऐसी घटनाएं कम होती गईं। अच्छी बात यह है कि अब भी उग्रवाद की छिटपुट घटनाओं के बावजूद ऐसी घटनाओं में आम लोगों के मारे जाने की संख्या 99% तक कम हुई है। 2014 के मुकाबले मणिपुर में उग्रवाद से जुड़ी घटनाओं में 80% की कमी आई है और हमलों में सुरक्षाबलों की मौत 75% तक कम हुई है।

नशे के खिलाफ गंभीर लड़ाई लड़ रही सरकार
कुछ साल पहले तक देश में सबसे ज्यादा ड्रग्स लेने वाली महिलाएं मणिपुर में थीं। 2015 की संयुक्त राष्ट्र की एक स्टडी के मुताबिक यहां 28% से ज्यादा महिलाएं इंजेक्शन के जरिए ड्रग्स लेती थीं। बीरेन सिंह सरकार ने 2018 में ‘वॉर ऑन ड्रग्स’ नाम के कैम्पेन की शुरुआत की। जिसके तहत ड्रग्स की सप्लाई ही काट दी गई। मणिपुर में अब तक 34 करोड़ रुपए के ड्रग्स जब्त कर नष्ट किए जा चुके हैं।

सालों से अनदेखी की शिकार रही जनता के लिए योजना ‘गो टू हिल्स’
बातचीत का रास्ता निकालने और जनता से लगातार संवाद के लिए बीरेन सिंह सरकार ने ‘गो टू हिल्स’ नाम की योजना चलाई। जिसके तहत पहाड़ों पर रहने वाले नागरिकों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया गया। इसमें लोगों के घरों पर जाकर पूछा जाता था कि उनका इस योजना में रज‌िस्ट्रेशन हो चुका है या नहीं? न होने पर रजिस्ट्रेशन किया जा रहा था। यह जनता सालों से सरकार की अनदेखी का शिकार थी। इस योजना की सफलता के बाद ग्रामीणों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए ‘गो टू विलेज’ नाम की योजना चलाई गई। सरकार के मुताबिक इससे पहाड़ों और घाटी में रहने वाले लोगों के बीच की खाई को भरने में मदद मिली।

एक स्थानीय अखबार के संपादक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘इबोबी सिंह की पिछली सरकार 15 साल सत्ता में थी और उसे अहंकार हो गया था। इसके चलते सरकार राज्य के अलग-अलग वर्गों से बातचीत ही नहीं करती थी। एन बीरेन सिंह उस सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। इसलिए उन्हें इन गलतियों का अंदाजा था। उन्होंने पिछली सरकार की गलतियों से सीख लेते हुए सभी वर्गों से बातचीत का रास्ता निकाला। हिंसा में आई कमी इसी का नतीजा है। उग्रवादियों को भी बातचीत से रास्ता निकलने का अहसास हुआ है, उन्हें हिंसा एकमात्र रास्ता नहीं लग रहा। हालांकि अभी उग्रवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।’

47% घरों तक पहुंचा पीने का स्वच्छ पानी, इनर लाइन परमिट भी मिली
मणिपुर में 2017 तक सिर्फ 5% घरों में पाइपवॉटर के जरिए पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था थी। अब तब से केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना जल जीवन मिशन के तहत करीब 47% घरों तक पीने का पानी पहुंचाया जा चुका है। सरकार की योजना 2022 तक हर घर में पीने का स्वच्छ पानी पहुंचाने की है।

इसके अलावा इनर लाइन परमिट मणिपुर के लिए एक बड़ा मुद्दा था। मणिपुर के लिए इस परमिट की व्यवस्‍था नहीं थी। इसके चलते बाहरी लोग बेरोक-टोक इस राज्य में आ-जा सकते थे। जबकि मणिपुर के पड़ोसी राज्यों नागालैंड और मिजोरम में यह व्यवस्था थी। दरअसल, इसके तहत बाहर से आने वाले लोगों को राज्य में प्रवेश से पहले अनुमति लेनी होती है। इसके न होने को मणिपुर के लोग अपने साथ अन्याय मानते थे। राज्य सरकार 2019 में इनर लाइन परमिट लागू कराने में सफल रही।

महिलाओं की स्थिति बेहतर, जनसंख्या स्थिरता की ओर
मणिपुर में महिलाओं की स्थिति न सिर्फ नॉर्थ-ईस्ट में बल्कि पूरे भारत से अच्छी है। यहां जनसंख्या में महिलाओं का अनुपात 1000 पुरुषों के मुकाबले 1066 है। पांचवें नेशनल फैमिली हेल्‍थ सर्वे (NFHS-5) के अनुसार, 2015-16 में यह अनुपात 1049 था, जिसमें पिछले 5 सालों में और सुधार हुआ है। यहां कि कुल महिलाओं में से 88% साक्षर हैं और 45% इंटरनेट का इस्तेमाल करती हैं।

2011 की जनगणना के मुताबिक मणिपुर की जनसंख्या मात्र 27.2 लाख थी। इस जनसंख्या में भी स्थिरता आ चुकी है क्योंकि NFHS-5 के डेटा के मुताबिक यहां प्रति महिला बच्चों की दर 2.2% पर पहुंच गई है। बता दें कि प्रति महिला बच्चों की दर 2.1% हो तो जनसंख्या में बढ़ोतरी स्थिर हो जाती है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में अब भी भारी सुधारों की जरूरत
पिछले 4 सालों में कई सेक्टर में मणिपुर की तस्वीर भले ही बहुत अच्छी हुई हो लेकिन राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की अब भी कमी है। स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां दिल की बीमारी या कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज कराने के लिए उन्हें गुवाहाटी, असम जाना पड़ता है। हालांकि हाल ही में इम्‍फाल में पहला कैंसर स्पेशियलटी हॉस्पिटल खुला है।

राज्य में 80% महिलाएं, डिलीवरी के लिए हॉस्पिटल आती हैं लेकिन इस दौरान सरकारी मदद के बाद भी, उनकी जेब से होने वाला खर्च देश के अन्य राज्यों के मुकाबले 3 से 5 गुना ज्यादा होता है। NFHS-5 के आंकड़ों के मुताबिक सरकारी हॉस्पिटल में डिलीवरी के बावजूद महिला को अपनी जेब से करीब 14,500 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। पिछले पांच सालों में यहां गर्भवती महिलाओं और बच्चों में एनीमिया की समस्या में भी बढ़ोतरी हुई है।

WHO की ओर से निर्धारित आंकड़े के मुताबिक भारत में 1000 की जनसंख्या पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन 2019-20 के इकॉनमिक सर्वे के मुताबिक भारत में यह अनुपात 1456 लोगों पर एक डॉक्टर का था। लेकिन साल 2018-19 के आंकड़ों के मुताबिक मणिपुर में 3000 की जनसंख्या पर एक डॉक्टर और 5000 की जनसंख्या पर एक हॉस्पिटल या डिस्पेंसरी है।

शांति के बावजूद स्थानीयों को टूरिस्ट का इंतजार
मणिपुर में अफस्पा अब भी लागू है। साल 2018 में अफस्पा के रिव्यू की बात कह चुके CM बीरेन सिंह ने पिछले हालात को देखते हुए अभी इसे जारी रखने की बात कही थी। वहीं स्थानीय लोग भी राज्य के वातावरण में आई शांति के बाद भी अभी टूरिस्टों के इंतजार में हैं। मशहूर झील लोकटक में नाव चलवाने का बिजनेस करने वाले महेश कहते हैं, ‘राज्य में पहले की अपेक्षा काफी शांति हुई है, उग्रवादी घटनाएं भी कम हो गई हैं लेकिन टूरिस्ट की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। ऐसा शायद राज्य की पहले से बनी छवि के चलते है। अगर धीरे-धीरे यहां आने वाले टूरिस्ट भी बढ़ें तो अच्छा हो।’

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