ब्लैक फंगस का खतरा: आयुर्वेदज्ञों का दावा- खून चूस ‘जोंक’ ठीक कर सकती है ब्लैक फंगस; IMA का तर्क- ये महामारी का वक्त, नॉन सीरियस बातें न करें


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नई दिल्ली6 मिनट पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

कोरोना के बीच एक और बीमारी अब महामारी का रूप लेती जा रही है। कोरोना से संक्रमित मरीजों पर ‘ब्लैक फंगस’ का खतरा मंडरा रहा है। यह बीमारी आंखों पर घातक असर डालने के साथ फेफड़ों और ब्रेन पर भी घातक प्रभाव छोड़ रही है। चार राज्यों ने इस बीमारी को महामारी घोषित कर इसके आंकड़े नोटिफाई करने के निर्देश दिए हैं।

ब्लैक फंगस के इलाज के लिए कोविड प्रोटोकाल के साथ एंटी फंगल दवाइयां दी जा रही हैं, लेकिन पटना के सरकारी आयुर्वेद कॉलेज ने इसके इलाज के लिए एक आयुर्वेदिक तरीका खोजने का दावा किया है जो इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। इसमें जोंक के जरिए मरीजों का इलाज किया जाता है। हालांकि एलोपैथिक डॉक्टरों का कहना है कि यह फंगल इंफेक्शन है और इसका इलाज जोंक द्वारा नहीं किया जा सकता है। डॉक्टरों के संगठन IMA का कहना है कि महामारी के दौर में ऐसे नॉन सीरियस दावे नहीं करने चाहिए, इससे लोगों में भ्रम बढ़ता है।

तो क्या वाकई जोंक के खून चूसने से ठीक हो जाएगा ब्लैक फंगस?
पटना के सरकारी आयुर्वेद कॉलेज के प्रिंसिपल दिनेश्वर प्रसाद ने दैनिक भास्कर को इस बारे में बताया, ‘आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में जोंक थेरेपी के बारे में बताया गया है। इसे जलौका ट्रीटमेंट भी कहते हैं। इससे ब्लैक फंगस का शुरुआती अवस्था में इलाज संभव है। अगर केंद्रीय आयुष मंत्रालय इसकी अनुमति देता है तो हम इस पर ट्रायल शुरू कर देंगे।’

वे कहते हैं, ‘सुश्रुत संहिता के 17वें अध्याय में लीच थेरेपी या जलौका थेरेपी का विस्तार से जिक्र है। दरअसल, त्वचा संबंधी एलर्जी, गंभीर घाव, शरीर में ब्लड की क्लॉटिंग होने, शरीर में विषाक्तता (खून के दूषित) होने पर इस पद्धति से इलाज हमेशा से किया जाता रहा है। आंखों की ग्लूकोमा नाम की बीमारी के इलाज में इसका इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है।’ ग्लूकोमा की बीमारी ज्यादातर 60 साल या फिर उससे ज्यादा उम्र के लोगों को होती है। इसमें आंखों की ऑप्टिक नर्व पर ज्यादा दबाव पड़ने पर रोशनी प्रभावित होती है।

पटना के सरकारी आयुर्वेद कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. दिनेश्वर प्रसाद कहते है कि आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में जोंक थेरेपी या जलौका ट्रीटमेंट का जिक्र है। ब्लैक फंगस के शुरुआती अवस्था में जोंक या लीच थेरेपी से इसका इलाज किया जा सकता है।

दिनेश्वर प्रसाद कहते हैं, ‘ब्लैक फंगस एक तरह का वातावरण में पाया जाने वाला ‘पैथोजन’ है। जो सांस के जरिए शरीर के भीतर चला जाता है। ब्लैक फंगस को म्यूक्रोमाइकोसिस भी कहते हैं। यह नाक को ब्लॉक कर देता है। इस बीमारी में नाक से काले या लाल रंग का डिस्चार्ज होता है। डबल विजन या धुंधला दिखाई देने लगता है। नैक्रोसिस यानी संक्रमण वाले हिस्से की कोशिकाओं को क्षति पहुंचाता है। खून का थक्का जम जाता है। प्रभावित हिस्से के खून में विषाक्तता आ जाती है। ये सभी ऐसे लक्षण है जिनका सुश्रुत संहिता में जिक्र किया गया है। इनके लिए जलौका यानी लीच थेरेपी को उपयोगी माना गया है।’

हालांकि प्रसाद यह भी कहते हैं कि ‘मैं यह नहीं कह रहा कि गंभीर अवस्था में पहुंचने पर ब्लैक फंगस के संक्रमण का इलाज किया जा सकता है, लेकिन शुरुआती अवस्था में अगर इस थेरेपी का इस्तेमाल करें तो इलाज संभव है।’

इलाज के लिए जोंक की सही पहचान जरूरी
दिनेश्वर प्रसाद कहते हैं, ’12 तरह की जोंक का जिक्र सुश्रुत संहिता में है। इनमें 6 विषैली होती हैं और 6 विषैली नहीं होती हैं। जो विषैली नहीं हैं, उनसे ही इलाज किया जाता है। कपिला, पिंगला, शंखमुखी, मूसिका, पुंडरीकमुखी और सावरिका। इन जोंक का इस्तेमाल ब्लैक फंगस के इलाज में होता है। इन्हें आयुर्वेद के जानकार ही पहचान सकते हैं। इसलिए ध्यान रहे, किसी भी जोंक को पकड़कर चिपकाना उलटा पड़ जाएगा।’

क्या है लीच थेरेपी और कैसे होता है इलाज?
दिनेश्वर प्रसाद के मुताबिक, जोंक को इकट्ठा कर पानी और मिट्टी से भरे एक टैंक में रखना होता है। उसके बाद सूखा मांस और कुछ जलीय पौधे इनके खाने के लिए रखने पड़ते हैं। हर तीसरे दिन पानी बदल देना चाहिए और ताजा खाना रख देना चाहिए। जोंक को चोटिल या संक्रमित जगह पर चिपकाना चाहिए। यह सिर्फ गंदा खून ही चूसती हैं। शुद्ध खून यह नहीं चूसतीं। जैसे ही गंदा खून उस जगह से खत्म हो जाता है, यह तुरंत उस हिस्से को छोड़ देती हैं। अगर न छोड़ें तो उस जगह पर थोड़ा नमक डाल देना चाहिए।

पटना के आयुर्वेद कॉलेज के डॉक्टरों का कहना है कि सुश्रुत संहिता में 12 तरह की जोंकों का जिक्र हैं। इनमें से छह विषैली और छह सामान्य होती हैं। थेरेपी के दौरान सामान्य जोंक का ही इस्तेमाल किया जाता है।

पटना के आयुर्वेद कॉलेज के डॉक्टरों का कहना है कि सुश्रुत संहिता में 12 तरह की जोंकों का जिक्र हैं। इनमें से छह विषैली और छह सामान्य होती हैं। थेरेपी के दौरान सामान्य जोंक का ही इस्तेमाल किया जाता है।

आयुष मंत्रालय के कोविड टास्क फोर्स ने कहा- इस बारे में अभी कोई विचार नहीं
आयुष मंत्रालय के तहत बने कोविड टास्क फोर्स के चेयरपर्सन भूषण पटवर्धन ने कहा, ‘कोविड टास्क फोर्स के पास ऐसा कोई प्रपोजल नहीं आया है। हमने ऐसी किसी थेरेपी के लिए अनुमति नहीं दी है।’ उधर, पटना आयुर्वेद कॉलेज के दिनेश्वर प्रसाद कहते हैं, ‘हमारी राज्य और केंद्रीय मंत्रालय में इसको लेकर बातचीत हुई है।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में आयुर्वेद डिपार्टमेंट की हेड डॉ. यामिनी भूषण ने लीच थेरेपी से ब्लैक फंगस के इलाज पर कहा, ‘जलौका ट्रीटमेंट त्वचा की बीमारी और खून में आई विषाक्तता को खत्म करने के लिए होता है। इससे ब्लैक फंगस ठीक होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अनुमति लेकर पहले क्लिनिकल ट्रायल होना चाहिए।’

अब तक ब्लैक फंगस के कितने मामले सामने आए?
महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली में ब्लैक फंगस के मामले देखे गए हैं। महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्रालय से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक वहां 1500 मामले सामने आए हैं तो गुजरात स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 900 लोग कोरोना से ठीक होने के बाद ब्लैंक फंगस का शिकार हुए हैं। दिल्ली में अब इसके मामले बढ़ते जा रहे हैं।

क्या कहते हैं एलोपैथिक डॉक्टर?

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के जनरल सेक्रेटरी डॉ. जयेश एम लेले लीच थेरेपी से ब्लैक फंगस के इलाज की संभावना पर कहते हैं, ‘किसी को यह क्यों नहीं समझ आ रहा कि देश ही नहीं पूरी दुनिया एक बड़े संकट में है। यह सर्दी-जुकाम नहीं, महामारी का दौर है। इस समय बिना किसी ट्रायल के कुछ भी बोल देना कितना नॉन सीरियस है। जिन आयुर्वेदाचार्य को यह संभव लगता हो तो पहले उन्हें क्लिनिक ट्रायल का अप्रूवल लेकर प्रमाण जुटाने चाहिए। न कि इलाज का दावा करना चाहिए।’

वे कहते हैं, ‘फर्स्ट वेव में सब कोरोनिल कोरोनिल कर रहे थे, कितने लोग ठीक हुए, आंकड़े क्यों नहीं जारी किए गए, सेकेंड वेव में कोरोनिल कहां है? डॉ. जयेश कहते हैं, ‘एक बड़े आयुर्वेदज्ञ ने कह दिया कि ब्रह्मांड में ऑक्सीजन ही ऑक्सीजन है, कोई कमी नहीं। पीपल के पेड़ के नीचे जाकर बैठ जाएं। तो देखिए अब मीडिया रोज एक स्टोरी ला रहा है कि फलां व्यक्ति पीपल के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया। मेरी गुजारिश है कि इस समय ऐसे नॉन सीरियस दावे न करें, क्योंकि ये दावे कितनों की जान ले लेंगे, आपको अंदाजा नहीं?’

अभी एम्फोटेरेसिन बी एंटी फंगल मेडिसिन से इसका इलाज हो रहा है। गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर मनीष मुंजाल ने बताया कि अभी उनके अस्पताल में ब्लैक फंगस के तकरीबन 50 मरीज हैं। जिनके लिए एम्फोटेरेसिन बी एंटी फंगल इंजेक्शन की जरूरत है। हमें ये इंजेक्शन खोजने में बहुत ज्यादा मशक्कत करनी पड़ रही है। मेडिकल स्टोर से अचानक यह इंजेक्शन गायब होने लगे हैं।

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