भाजपा महासचिव का इंटरव्यू: भूपेंदर यादव बोले- कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई मजबूत, विपक्ष को जनता वैसे ही जवाब देगी, जैसा 2019 में दिया था


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नई दिल्ली7 मिनट पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और देश में कोरोना की स्थिति को लेकर भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सवालों के घेरे में खड़ा किया जा रहा है, लेकिन दोनों ही मोर्चों पर सरकार और मोदी की परफॉर्मेंस को भाजपा पूरी तरह बेहतर ही बता रही है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव भूपेंदर यादव ने कहा कि बंगाल में हम जहां थे, वहां से काफी आगे बढ़ गए हैं। अब हम वहां बेहद मजबूत विपक्ष हैं। जहां तक बात कोरोना की है, तो उसके खिलाफ केंद्र ने मजबूत लड़ाई लड़ी है। विपक्ष के आरोपों पर जनता वैसे ही जवाब देगी, जैसे 2019 में दिया था। पढ़िए, उनसे हमारे सवाल-जवाब…

बंगाल की हार के बाद पार्टी के भीतर क्या कोई मंथन हुआ? हार के कौन-कौन से कारण सामने आए?
भाजपा की चुनाव नतीजों की समीक्षा करने की एक पद्धति है। यह ठीक है कि बंगाल में हमारी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि भाजपा के जनाधार में पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में बहुत बड़ी बढ़ोतरी हुई है। जिस राज्य में वर्ष 2016 में हम सिर्फ 10% वोट पाकर 3 सीट जीते थे, वहां आज हमारे पास 38% वोट और 77 विधायकों समेत 18 सांसद हैं। पिछले चुनाव में भाजपा जहां चौथे पायदान पर थी, आज वह प्रमुख और सशक्त विपक्ष बनकर उभरी है। परिणामों का विश्लेषण तो होगा ही, लेकिन इस बड़े परिवर्तन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अभी पार्टी अध्यक्ष नड्डा की बैठकें हुई हैं दो दिन तक, इनमें किन मुद्दों पर चर्चा हुई? वर्चुअल सभा का फैसला क्या पिछली रैलियों की आलोचना के चलते लिया है?
बैठक में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान पार्टी के संगठन और कार्यकर्ताओं द्वारा देशभर में किए गए सेवा कार्यों की रिपोर्ट रखी गई। पार्टी ने एक लाख हेल्थ वॉलंटियर तैयार करने के लिए अभियान चलाने का फैसला लिया है। जहां तक बात वर्चुअल रैली की है तो भाजपा ही अकेली पार्टी थी, जिसने कोरोना की पहली लहर के दौरान सबसे ज्यादा जनसंवाद वर्चुअल किए। संगठन और कार्यसमिति की बैठकें भी वर्चुअली हुईं। यह कहना बिल्कुल ठीक नहीं होगा कि वर्चुअल सभाओं का फैसला किसी आलोचना की वजह से लिया गया।

अगले साल 5 राज्यों में चुनाव हैं, मोटे तौर पर किन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएंगे?
हम जनता के बीच अपने कामों और नेतृत्व की विश्वसनीयता को लेकर जाएंगे। यही चुनावों में उतरने का आधार होगा। हम लोगों को पिछले 7 सालों में किए गए केंद्र के कार्यों और उपलब्धियों के बारे में बताएंगे। उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड जैसे चुनावी राज्यों में जहां भाजपा की सरकारें है, वहां उन सरकारी कार्यों को तो गिनाएंगे ही, हम बेहतरीन तरह से कोरोना का प्रबंधन कर पाए, यह भी जनता को बताएंगे।

दूसरी लहर के दौरान हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर चरमरा गया, श्मशान घाट में लाशों का अंबार लग गया, प्रधानमंत्री की छवि को क्षति पहुंची, डैमेज कंट्रोल कैसे होगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की छवि को नुकसान पहुंचा है, ऐसा मानना पूरी तरह निराधार है। थोड़ा पीछे जाकर अगर आप देखें तो पाएंगी कि हर बड़े फैसले के बाद विपक्ष के कुछ लोग जानबूझकर दुष्प्रचार में जुट जाते हैं कि मोदी जी की छवि कमजोर हुई है। 2019 से पहले भी ऐसा ही करने की कोशिश की गई थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में जनता ने विपक्षी दलों के इस दुष्प्रचार को झुठला दिया था। जहां तक बात कोविड लहर की है तो सरकार ने हर संभव तरीके से इससे निपटने के प्रयास किए हैं। राज्यों को लगातार केंद्र सरकार ने चेतावनी दी थी। राज्यों से चर्चा कर ऑक्सीजन, दवाई आदि की व्यवस्था भी की गई। अब ऑक्सीजन की आपूर्ति भी लगातार हो रही है और तेजी से टीकाकरण भी हो रहा है। हम कोरोना के खिलाफ मजबूती से लड़ाई लड़ रहे हैं।

यूपी, गुजरात में कोविड मिसमैनेजमेंट की खूब चर्चा रही, जनता सवाल पूछेगी, उत्तराखंड में कुंभ आयोजन पर भी सवाल उठेंगे, क्या जवाब देंगे?
ये जनता के नहीं, विपक्ष के सवाल हैं। विपक्ष के सवाल “चित भी मेरी, पट भी मेरी’ वाले हैं। इन सवालों पर ज्यादा गंभीर होने की आवश्यकता नहीं है। विपक्ष, खासतौर पर कांग्रेस उन राज्यों की तरफ तो देखती भी नहीं है, जहां उनकी सरकार है। पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों को भी कुछ सुझाव कांग्रेस को देने चाहिए। वहां भी हालात बहुत खराब ही थे।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि दूसरी लहर ने देश के सामने कठिन हालात पैदा किए। हमारी सरकारों ने हर संभव प्रयास भी किए। नतीजा सामने है। यूपी, गुजरात, उत्तराखंड जैसे राज्यों में आंकड़ा अब बहुत नीचे चला गया है। जहां तक कुंभ के आयोजन का सवाल है तो कोरोना की दूसरी लहर शुरू होते ही प्रधानमंत्री की अपील पर संत समाज ने इसे सांकेतिक रूप दे दिया था।

यूपी चुनाव में अहम मुद्दे क्या होंगे?
जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि हर चुनावी राज्य में विकास और सुशासन का ही मुद्दा होगा।

यूपी में क्या आप योगी जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे?
यूपी में योगी जी के नेतृत्व के विषय में राधामोहन सिंह जी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं। इसमें अब ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

कुछ रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में मुस्लिम उम्मीदवार भी उतारने का मन बना रही है, क्या यूपी में अब नरम हिंदुत्व की नीति पर चलेंगे?
पहली बात, किसी मीडिया रिपोर्ट या अटकलों के आधार पर मैं अपनी पार्टी की चुनावी रणनीति के बारे में कोई जवाब देना उचित नहीं समझता। चुनाव करीब आने पर संगठन और शीर्ष नेतृत्व द्वारा जब उम्मीदवारों के नामों की घोषणा होगी तो सब स्पष्ट हो जाएगा। अभी से अटकलें लगाने का कोई लाभ नहीं।

CBSE में परीक्षा कैंसिल कर मोदी सरकार ने एक सकारात्मक संदेश दिया है, केवल CBSE में करीब 1.5 करोड़ बच्चे हैं, राज्यों में भी परीक्षा कैंसिल हो रही है, अगले साल यही बच्चे वोटर होंगे, क्या कहना चाहेंगे?
पार्टी कभी यह सोचकर कोई निर्णय नहीं लेती कि ये फैसला हमें वोट दिलाएगा। कोविड का संकट है और तीसरी लहर के आने की आशंका भी है। लिहाजा बच्चों की परीक्षा कैंसिल कर दी गई। इसमें किसी भी तरह की राजनीति देखना उचित नहीं।

मुफ्त वैक्सीनेशन की घोषणा करने में देर क्यों हुई? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह मजबूरी में लिया गया फैसला है, जैसा कि विपक्ष कह रहा है?
16 जनवरी से केंद्र ने वैक्सीनेशन की जो व्यवस्था की थी, वह मुफ्त ही थी। विपक्षी दलों ने तो वैक्सीन को लेकर शुरू से ही दोहरे रवैये का परिचय दिया है। वे खुद ही वैक्सीनेशन के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं और खुद ही मुफ्त वैक्सीन देने के लिए भी कहते हैं। वैक्सीन पर सवाल उठाते हैं और खुद ही जाकर वैक्सीन भी लगवा लेते हैं। मेरी समझ से विपक्ष की बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।

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