भास्कर इंटरव्यू: ट्रक ड्राइवर को किडनी देने वाले उद्योगपति चिट्टिलापल्ली शेयर बेच लोगों की मदद कर रहे, कहते हैं- हमें दायित्व निभाने ही चाहिए


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तिरुअनंतपुरम6 मिनट पहलेलेखक: के ए शाजी

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परोपकार के लिए चर्चा में रहते हैं 8 हजार करोड़ की कंपनी के मानद चेयरमैन चिट्टिलापल्ली।

के चिट्टिलापल्ली वी गार्ड कंपनी के मानद चेयरमैन हैं। वे अपनी कंपनी के शेयर बेचकर पैसों की कमी का सामना करने वाले छोटे-छोटे उद्यमियों की मदद के लिए चर्चा में रहते हैं। 10 साल पहले एक अजनबी ट्रक ड्राइवर को अपनी एक किडनी तक दान कर चुके हैं। फोर्ब्स मैगजीन के मुताबिक उनकी कंपनी की नेटवर्थ 8.8 हजार करोड़ रु. है। दैनिक भास्कर ने उनसे कारोबार, परोपकार समेत कई मुद्दों पर बात की।

किडनी दान करने की प्रेरणा कैसे मिली?
मेरे एक दूर की महिला रिश्तेदार को किडनी की समस्या थी। मैंने परिवार को किडनी के लिए संघर्ष करते देखा। इसने मुझे हिला दिया। फिर तय किया कि मैं अपनी किडनी दान करूंगा। 60 साल की उम्र में एक ट्रक ड्राइवर को किडनी दान दी। 10 साल बाद भी मैं स्वस्थ हूं। मैं रोमांचित हूं कि वो ट्रक ड्राइवर अब भी ट्रक चला रहा है।

आपने सामाजिक कार्य के लिए 40 लाख शेयर बेच 90 करोड़ रु. जुटाए हैं, इसका इस्तेमाल कैसे करेंगे?
हम चिट्टिलापल्ली स्क्वेयर बनाएंगे। यह सामाजिक गतिविधियों का हब होगा। इसमें लोगों के लिए पार्क, जॉगिंग ट्रैक, स्पोर्ट्स-योगा कॉम्पलैक्स, हेल्थ क्लब, एंफीथियेटर और एडिटोरियम जैसी सुविधाएं मिलेंगी।
भविष्य में और क्या योजना है?
चिट्टिलापल्ली फाउंडेशन के जरिए हम उद्यमी विकसित कर रहे हैं। पैसों की कमी का सामना कर रहे उद्यमियों की मदद के लिए हमने के. चिट्टिलापल्ली कैपिटल प्रा. लि. कंपनी के पंजीकरण के लिए रिजर्व बैंक में आवेदन किया है। इससे सरल शर्तों पर जरूरतमंदों को सस्ता लोन मिलेगा। हमारा मानना ​​है कि हम सभी के कुछ सामाजिक दायित्व हैं, जो हमें करना ही होगा।
आप खुद को सफल मानते हैं?
अब तक की यात्रा में मैंने काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। मैंने अपनी असफलता का इस्तेमाल सफलता की सीढ़ी के तौर पर करना सीखा। वी-गार्ड और वंडरला दोनों उद्यमों में हमारी प्राथमिकता हमेशा क्वालिटी रही है। हम ग्राहकों से लेकर कच्चे माल के सप्लायर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स के साथ विनम्रता से आगे बढ़ते हैं। यही सफलता का फॉर्मूला है।
किताबें लिखना कैसे शुरू किया?
मैं पूरी तरह से टेक्नोलॉजी का आदमी हूं। लेकिन संयोग से कंपनी के इन-हाउस पत्रिका में रोजमर्रा की चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान पर लिखने का मौका मिला। कुछ संस्मरण लिखे हैं। अब यह लेख पुस्तक की शक्ल ले चुकी हैं। साथ ही मैंने अंग दान पर भी पुस्तक लिखी है।
अब तक की यात्रा कैसी रही है?
मैं 70 के दशक में तिरुअनंतपुरम की एक कंपनी में काम करता था। कंपनी संकट में आ गई। मुझे करियर अंधेरे में दिखने लगा। फिर अपना काम शुरू किया। उन दिनों वोल्टेज का ऊपर-नीचे होना समस्या थी। 2 लोगों के साथ स्टेब्लाइजर बनाना शुरू किया। डिमांड होने से काम चल निकला।

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