भास्कर एक्सक्लूसिव: फेक है कॉल फॉर जस्टिस; दिल्ली दंगे और अब बंगाल हिंसा पर गृह मंत्रालय को फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट सौंपी गई, लेकिन न पता सही और न वेबसाइट


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नई दिल्ली5 मिनट पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

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दो महीने पहले बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा और पिछले साल दिल्ली दंगे के बाद एक संस्था ने खूब नाम कमाया। उसका नाम है ‘कॉल फॉर जस्टिस’। इस संस्था ने दोनों ही हिंसा के बाद अपनी टीम मौके पर भेजी। जिसने जांच-पड़ताल के बाद अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी।

दिल्ली दंगे की रिपोर्ट 29 मई 2020 को गृहमंत्री अमित शाह को और बंगाल हिंसा की रिपोर्ट पिछले ही महीने, यानी 29 जून को गृह राज्य मंत्री जी. कृष्णा रेड्डी को सौंपी गई। हालिया रिपोर्ट तैयार करने वालों में सरकार में ऊंचे-ऊंचे ओहदों से रिटायर हुए लोग शामिल थे। उन्होंने 15 से 20 जून के बीच गहरी पड़ताल के बाद यह रिपोर्ट तैयार की थी।

‘कॉल फॉर जस्टिस’ की इस 63 पन्ने की रिपोर्ट के 37वें पेज पर संस्था के बारे में बताया गया है। संस्था के नाम पर एक वेबसाइट भी है, जिसे देखकर नहीं लगता कि इस संस्था ने दिल्ली दंगे और बंगाल हिंसा जैसे मुद्दों पर काम किया है। वेबसाइट के पहले पन्ने में हेल्दी सेपरेशन के लिए टिप्स (Tips for Healthy Separation) और अगर आप किसी सड़क दुर्घटना का शिकार हो जाएं तो कौन से कानून लगेंगे, ऐसी रिपोर्ट सामने आती हैं।

सामान्य वेबसाइट में भी संस्था की डिटेल होती है, लेकिन इस वेबसाइट में संस्था यानी ‘कॉल फॉर जस्टिस’ के बारे में न कुछ दिया गया है और न ही पिछली पड़ताल यानी दिल्ली दंगे की जांच रिपोर्ट वेबसाइट में कहीं अपलोड की गई है। कॉन्टैक्ट के नाम पर सिर्फ एक ईमेल एड्रेस है। इससे थोड़ा संदेह हुआ, जिसे दूर करने के लिए हमने वेबसाइट पर दिए ईमेल पर जानकारी के बाबत एक मेल भेजा, लेकिन 6 दिन तक इंतजार के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला।

जिस संस्था की रिपोर्ट सीधे देश के गृह मंत्री और गृह राज्य मंत्री को सौंपी जा रही हो, उसके बारे में लोगों को पता होना जरूरी है। इसलिए हमने ‘कॉल फॉर जस्टिस- न्याय की पुकार’ संस्था की पड़ताल शुरू की। उसी पड़ताल की कहानी है ये, आप भी पढ़िए…

वेबसाइट न सही, दफ्तर तो होगा
हमने इंटरनेट खंगालने से ही अपनी पड़ताल शुरू की। पर क्या कोई संस्था बिना वेबसाइट के नहीं हो सकती? बिल्कुल हो सकती है। तो अगली खोज दफ्तर के पते के लिए शुरू हुई। ‘कॉल फॉर जस्टिस’ ट्रस्ट का फोन नंबर पाने के लिए बंगाल हिंसा की फैक्ट फाइंडिंग टीम को तलाशना शुरू किया।

रिपोर्ट में टीम के एक मेंबर एम. मदन गोपाल का मोबाइल नंबर था। दरअसल, इस रिपोर्ट के सबसे आखिर में annexure में बंगाल के एक अधिकारी से चैट करते हुए एम. मदन गोपाल ने अपना नंबर उनसे साझा किया था। लिहाजा वह फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में भी दर्ज हो गया। यहां से यह नंबर मिला। इस बीच कमेटी के एक और मेंबर का फोन नंबर भी मिला, जो रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी और झारखंड की पूर्व डीजीपी निर्मल कौर का था।

निर्मल कौर से लंबी बातचीत हुई। यह पूछने पर कि आपको बंगाल में फैक्ट फाइंडिंग के लिए किस संस्था ने बुलाया? उन्होंने कहा कि ‘कॉल फॉर जस्टिस नाम की एक संस्था का मेल आया था। मुझे लगा यह नेक काम है। आखिर मैं पूर्व डीजीपी रही हूं, सो मैंने पड़ताल के लिए हामी भर दी।’ मैंने पूछा कि क्या इस संस्था के किसी ट्रस्टी का नंबर दे सकती हैं? तो वो बोलीं- ‘आपको जो पूछना है, मुझसे पूछ सकती हैं। फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट हमने ही तैयार की है।’

मैंने फिर पूछा कि क्या संस्था के किसी अधिकारी का नंबर दे सकती हैं? उन्होंने कहा- ‘हम ऐसे किसी का नंबर आपसे कैसे शेयर कर सकते हैं?’ हालांकि बाद में उन्होंने फैक्ट फाइंडिंग टीम के चेयरमैन पूर्व चीफ जस्टिस सिक्किम जस्टिस प्रमोद कोहली का मोबाइल नंबर दिया।

हमने जस्टिस कोहली को फोन किया। उनसे हमने रिपोर्ट में दर्ज संस्था के मुखिया जस्टिस वीके गुप्ता और दूसरे ट्रस्टी पूर्व आईएफएस विद्यासागर वर्मा और पूर्व डायरेक्टर एम्स एवं फोरेंसिक एक्सपर्ट टीडी डोगरा में से किसी का नंबर देने की गुजारिश की।

जस्टिस कोहली ने रिपोर्ट में दर्ज किसी ट्रस्टी का नंबर न देकर, एक अन्य व्यक्ति का नंबर दिया और बताया कि वे चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और सब बता देंगे। इनका नाम है चंद्र वाधवा। हालांकि जस्टिस कोहली ने ये नहीं बताया कि वाधवा ‘कॉल फॉर जस्टिस’ के ट्रस्टी भी हैं।

हमने चंद्र वाधवा को फोन लगाया, साथ ही रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर एम.मदन गोपाल से भी फोन पर बात की। गोपाल ने आगे किसी का नंबर देने से मना कर दिया। बाकी जवाब भी पिछले दो टीम मेंबर से मिलता-जुलता ही दिया। कहा- ‘आपको ट्रस्टी का नंबर क्यों चाहिए? रिपोर्ट हमने तैयार की है। पूछिए जो पूछना है।’

हमने संस्था के दफ्तर के बारे में पूछा तो फिर वही जवाब कि ‘यह रिपोर्ट गंभीर छानबीन के बाद बनाई है। आपकी रुचि रिपोर्ट में होनी चाहिए। मुद्दा यह है कि बंगाल चुनाव नतीजों के बाद हिंसा में किसका हाथ था? हिंसा पीड़ितों के साथ क्या-क्या हुआ?’ गोपाल ने भी ‘कॉल फॉर जस्टिस’ के ट्रस्टी और दफ्तर का पता देने से मना कर दिया।

दिल्ली के बाराखंबा रोड पर चंद्र वाधवा का दफ्तर। फोटो: संध्या

दिल्ली के बाराखंबा रोड पर चंद्र वाधवा का दफ्तर। फोटो: संध्या

अब जस्टिस प्रमोद कोहली का दिया नंबर हमारी आखिरी उम्मीद थी संस्था के असल ठिकाने तक पहुंचने की। हमने चंद्र वाधवा को फोन किया। ​​​​​वाधवा का सवाल था कि वीके गुप्ता या अन्य लोगों के नंबर क्यों चाहिए? मैं भी कॉल फॉर जस्टिस का ट्रस्टी हूं, पूछिए क्या पूछना है।

उनका संस्था के ट्रस्टी होने वाली बात मेरे लिए नई थी। खैर हमने वाधवा से ‘कॉल फॉर जस्टिस’ के दफ्तर का पता और वेबसाइट का लिंक मांगा। यह भी पूछा कि संस्था कब बनी? जो वेबसाइट हमने तलाश की थी, उसका भी जिक्र किया। यह भी कहा कि ‘जस्टिस फॉर कॉल’ नाम से जो वेबसाइट मिली है। उसमें संस्था के बारे में कोई जानकारी नहीं। आपकी रिपोर्ट में दर्ज है कि आपने दिल्ली दंगों और केरल दंगों की पड़ताल की है, लेकिन इन रिपोर्ट्स का वेबसाइट में कोई जिक्र नहीं। उल्टे इसमें कुछ ऐसे आर्टिकल हैं जो किसी फीचर वेबसाइट के लिए लगते हैं।

इन सब बातों के जवाब में वाधवा ने इस वेबसाइट के लिंक को न नकारा और न स्वीकारा। उन्होंने बस इतना कहा कि उनके समेत 10 से 11 लोग संस्था के ट्रस्टी हैं और यह संस्था 2014-15 में बनी थी। तारीख याद नहीं। हमने कहा- आप कल तक जानकारी जुटा लें, मैं फिर फोन करूंगी। उन्होंने कहा- आप सारे सवाल मैसेज कर दें। उनके कहे के मुताबिक हमने 30 जून को सारे सवाल मैसेज कर दिए। पर जवाब देने की जगह उन्होंने अब फोन उठाना ही बंद कर दिया।

हमने अगले तीन दिन तक कई बार फोन और मैसेज किए। वाधवा से बात करने के साथ ही हम उनकी गूगल में मौजूदगी भी खोज रहे थे। हमने अब उनकी फाइनेंस कंपनी Chandr awadhava.co का पता तलाशा और बिना अप्वाइंटमेंट दफ्तर पहुंच गए।

वाधवा ने आखिर क्यों बोला झूठ?
दिल्ली के बाराखंबा स्थित विजया बिल्डिंग के 13वें फ्लोर में मौजूद दफ्तर पर पहुंचकर मैंने रिसेप्शन में अपना परिचय देते हुए वाधवा को बताने को कहा। वाधवा ने दफ्तर के लैंडलाइन फोन पर मुझे बुलाया और कहा, ‘मैं दो दिन से बीमार था, इसलिए आपके सवालों का जवाब नहीं भेज पाया।’ उनसे मिलने का वक्त मांगा तो उन्होंने मीटिंग का हवाला देकर मिलने से मना कर दिया।

बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर रजिस्टर मेंटेन करने वाले गार्ड से पूछा तो उसने बताया कि वाधवा साहब तो रोज दफ्तर आ रहे हैं। कल भी आए थे, लेकिन शाम चार से साढ़े चार के बीच निकल गए थे। तो फिर यह झूठ क्यों? मैंने उन्हें फिर फोन किया। फोन उठा, मैंने कहा- सर मुझे पांच मिनट का वक्त चाहिए। मैं कनॉट प्लेस में शाम 6.30 बजे तक हूं। तब शाम के चार बज रहे थे। इस पर उन्होंने कहा, ‘मैं आपके सवालों का जवाब देने के काम में किसी को लगाता हूं, आपको सारी जानकारी मैसेज की जाएगी।’ मैंने फिर कहा कि सर एक संस्था जो 2014 से चल रही है, आखिर उसका पता बताने और वेबसाइट लिंक की पुष्टि करने में कितना वक्त लगेगा?

पर उन्होंने इस पर कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन वे बस यही कहते रहे कि आप रिपोर्ट देखिए, संस्था के बारे में क्यों पता करना है आपको? ट्रस्टी से क्यों बात करनी है? हमने पूरी रिपोर्ट भी पढ़ी। वह कितनी पक्की है, और फैक्ट फाइंडिंग टीम ने किस तरह फैक्ट जांचे और इकट्ठे किए, हम इसके बारे में भी इसी रिपोर्ट में बताएंगे, लेकिन पहले ‘कॉल फॉर जस्टिस’ संस्था के दफ्तर और सही वेबसाइट को तो खोज लें?

पते के साथ फिर शुरू हुई दफ्तर की खोज
आखिरकार शनिवार, 3 जुलाई को वाधवा का मैसेज आया, उसमें दफ्तर का पता- 11/68, Shanti Chambers, Pusa Road, ND था और वेबसाइट का लिंक www.calljustice.in था। संस्था बनने का साल 2014 लिखा था। मैंने वेबसाइट क्लिक की। पर वह नहीं खुली। फोन किया तो वाधवा ने कहा- साइट अंडर मेंटेनेंस है। फिर सोचा दफ्तर का पता तो सही ही होगा! शनिवार 3 बजे दफ्तर खोजने उस पते पर पहुंचे। गूगल मैप ने हमें बताया कि यह शांति चैंबर ओल्ड रजिंदर नगर में मौजूद है।

दिल्ली की पूसा रोड पर वह शांति चैम्बर्स जहां कॉल फॉर जस्टिस का रजिस्टर्ड ऑफिस बताया गया है।- फोटो: संध्या

दिल्ली की पूसा रोड पर वह शांति चैम्बर्स जहां कॉल फॉर जस्टिस का रजिस्टर्ड ऑफिस बताया गया है।- फोटो: संध्या

42 किलोमीटर का सफर तय कर हम उस पते पर पहुंचे। दिल्ली के मशहूर हाॅस्पिटल बीएल कपूर के सामने मौजूद ‘शांति चैंबर्स’ नाम के मार्केट प्लेस में यह दफ्तर नहीं मिला। हमने वहां मौजूद सभी गार्ड और दुकान वालों से बात की। उनसे पूछा तो उन्होंने कहा, इस नाम का कोई दफ्तर यहां नहीं है। एक व्यक्ति ने बताया वह इस कॉम्प्लेक्स में पिछले 15 सालों से काम कर रहा है, लेकिन यहां इस नाम का दफ्तर कभी नहीं देखा।

बहुत पहले ‘वेल डन अब्बा’ एक मूवी देखी थी। उसमें एक कुआं चोरी होने की कहानी है। उस चोरी हुए कुंए के लिए एक बाप-बेटी धरना देते हैं। तो क्या उस कुएं की तरह ‘कॉल फॉर जस्टिस’ का दफ्तर भी चोरी हो गया? वाधवा को फिर फोन मिलाया। अब उन्होंने धमकाना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा- ‘आखिर आप मेरे पीछे क्यों पड़ी हैं? दफ्तर से क्या लेना-देना? आपका एजेंडा क्या है? आपको मारे-पीटे गए लोग नहीं दिखते?’

वे अपना आपा इतना खो चुके थे कि एडिटर को मेल करने की धमकी भी दे डाली। मैंने कहा- मुझे बस इतना जानना है कि एक संस्था जिसने कई नामों को दिल्ली दंगों के गुनहगारों की सूची में शामिल कर दिया। पोस्ट पोल वॉयलेंस की रिपोर्ट को गृह राज्य मंत्री को सौंप दिया। यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट से स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनाने की सिफारिश भी करती है। आखिर ऐसी रिपोर्ट्स को बनाने वाली संस्था का वजूद क्या है? लेकिन वो धमकाते रहे।

वाधवा ने जो लिंक भेजा, वह भी शक के दायरे में?
वेबसाइट का नाम www.calljustice.in बताया गया जबकि संस्था का नाम कॉल फॉर जस्टिस था। वेबसाइट और संस्था के नाम में फर्क के बावजूद हमने यह जानना चाहा कि इस वेबसाइट का डोमेन कब रजिस्टर हुआ? लिहाजा हमने एक सरकारी विभाग के वेबसाइट डेवलपर से संपर्क किया। उन्होंने बताया कि पिछले साल 22 मई को यह वेबसाइट बनी थी। यानी दिल्ली दंगों के करीब 3 महीने बाद। दंगे फरवरी 2020 में हुए थे।

इस वेबसाइट को कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया और जिस प्लेटफॉर्म पर यह वेबसाइट बनी है, Wix.com उसका इस्तेमाल प्रोफेशनल्स नहीं करते। यह मुफ्त में वेबसाइट बनाने की सुविधा देती है। अगर कोई व्यक्तिगत तौर पर अपनी वेबसाइट बनाना चाहता है तो इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करता है। वजह इसमें बहुत कम डेटा अपलोड करने की क्षमता और प्रोफेशनल न दिखना है।

फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्यों का परिचय

1- जस्टिस प्रमोद कोहली, चेयरमैन

जस्टिस प्रमोद कोहली ने करियर की शुरुआत जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट से 2003 में बतौर एडिशनल जज से की थी। साल 2011 में बतौर चीफ जस्टिस प्रमोद कोहली का ट्रांसफर सिक्किम हाईकोर्ट में हुआ। इससे पहले वे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस थे। वे झारखंड के हाईकोर्ट में भी रहे।

दिसंबर 2019 में इनका नाम चर्चा में तब आया जब इन्होंने सीएए के समर्थन में कई बयान दिया। नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों को इन्होंने एक पैनल में चर्चा के दौरान गलत बताया था। इन्होंने कहा था कि जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं इनमें से अधिकतर को यह पता नहीं कि इसका प्रभाव क्या है। सीएए से अल्पसंख्यकों को नुकसान नहीं होने वाला। 23 अप्रैल 2017 को इन्हें महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा गया। 18 नवंबर 2017 को ही इन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पीएन भगवती अवॉर्ड से भी सम्मानित किया था।

2- आनंद बोस, आईएएस (रिटायर्ड), पूर्व चीफ सेक्रेटरी- केरल
2019 में मोदी सरकार के ‘सबका मकान, सस्ता मकान’ स्लोगन भला किसे याद नहीं होगा। अफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम जिसमें 2022 तक सबके लिए छत का वादा मोदी सरकार ने किया था। दरअसल, इस योजना का आधार 1989 में केरल में सिविल सर्वेंट रहते हुए सी.वी. आनंद बोस द्वारा बनाई गई संस्था ‘निर्मिती केंद्र’ है।

दरअसल, यह संस्था राज्य की एक सरकारी संस्था है जो सस्ता और एनवायरनमेंट फ्रेंडली घर लोगों को मुहैया कराने का वादा करती है। ठीक इसी तर्ज पर मोदी सरकार ने भी सबके लिए छत का वादा किया था। हालांकि केरल सरकार की यह संस्था अपने वादे से कोसों दूर है। 2019 के चुनाव के दौरान आनंद बोस बेहद सक्रिय थे।

पॉलिसी लेवल पर होने वाली बैठकों में आनंद बोस की अहम हिस्सेदारी थी। 2019 के चुनाव में पूर्व चीफ सेक्रेटरी केरल के मोदी कैबिनेट में शामिल होने की चर्चा जोरों पर थी। हालांकि उनका नाम उसमें शामिल नहीं हुआ, लेकिन नरेंद्र मोदी से इनकी करीबी की चर्चा चलती रही।

3- निर्मल कौर, पूर्व डीजीपी- झारखंड
निर्मल कौर 1983 बैच की आईपीएस ऑफिसर हैं। सेंट्रल डेप्यूटेशन पर वे लंबे समय तक दिल्ली में रहीं। उसके बाद उन्हें झारखंड पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन में ट्रांसफर किया गया। वे झारखंड से ही डायरेक्टर जनरल पुलिस (डीजीपी) के पद से रिटायर भी हुईं।

4- निसार अहमद
अहमद जनवरी 2012 में इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनीज सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया (आईसीएसआई) के प्रेसिडेंट चुने गए। यह देश की एक अहम नेशनल प्रोफेशनल बॉडी है। यह कॉर्पोरेट मंत्रालय के तहत काम करती है।

5- एम मदन गोपाल- रिटायर्ड आईएएस अधिकारी

कर्नाटक इको टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड की कार्यकारी कमेटी में मार्च, 2021 में पूर्व एडिशनल चीफ सेक्रेटरी मदन गोपाल ने बतौर चेयरमैन पद संभाला था। इस साल वे तब चर्चा में आए जब उन्होंने कर्नाटक सरकार को एक पत्र लिखकर कहा था कि वे इस पद के लिए महज 1 रु. प्रति माह पारिश्रमिक ही लेंगे।

1984 बैच के आईएएस अधिकारी मदन गोपाल ने तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कर्नाटक सरकार के विभिन्न महकमों में अपनी सेवाएं दीं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, खाद्य एवं आपूर्ति, उच्च शिक्षा, खनन, जल संसाधन समेत कई अन्य विभागों में काम किया। साल 2015 में आईएएस अधिकारी मदन गोपाल ने कर्नाटक सरकार के ईमानदार आईएएस अधिकारी डीके रवि की मौत को लेकर सीबीआई जांच की मांग की थी। दरअसल, डीके रवि की आत्महत्या के पीछे कर्नाटक सरकार में उस वक्त हाई प्रोफाइल मंत्री के जे जॉर्ज का नाम सामने आया था। कहा जा रहा था कि डी के रवि को के जे जॉर्ज के घर में रेड डालने की वजह से धमकियां दी जा रही थीं।

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