भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट: बरसाना नहीं, बल्कि गोकुल के रावल में जन्मी थीं राधारानी, यहां बाल स्वरूप विराजमान इसलिए लाड़लीजी कहलाईं


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रावल (गोकुल)10 मिनट पहले

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राधाष्टमी 14 को, रावल में जन्मोत्सव मनाने के लिए आने लगे श्रद्धालु।

इस समय हम भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी राधारानी के असली गांव रावल में हैं। यहां राधाष्टमी यानी लाड़लीजी के जन्मोत्सव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। बाहर से श्रद्धालुओं का आना जारी है। मंदिर को पूरे मनोयोग से सजाया जा रहा है। राधारानी का जन्मोत्सव 13 सितंबर को छठी पूजन से शुरू होगा। अगले दिन 14 सितंबर को जन्मोत्सव और 15 सितंबर को बधाई उत्सव मनाया जाएगा।

जन धारणा यही है कि राधाजी का जन्म बरसाना में हुआ था। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। ब्रज संस्कृति मर्मज्ञ डॉ. भगवान मकरंद बताते हैं कि वृषभानु जी को राधारानी रावल में ही यमुना स्नान के दौरान कमल पुष्प में मिली थीं। इसलिए यहां उनका छोटे बच्चे की तरह घुटमन चलते हुए बाल स्वरूप है। चूंकि ब्रज में बेटी को प्यार से लाड़ो भी कहते हैं, इसलिए राधारानी को यहां लाड़लीजी के नाम से जानते हैं।

गर्ग संहिता, ब्रज परमानंद सागर, मथुरा डिस्ट्रिक मेमोरियल बुक और ब्रज वैभव पुस्तक में भी रावल गांव का जिक्र है। यहीं वृषभानु-कीर्ति जी के राजमहल/रनिवास थे। इसलिए इस स्थान को रावल कहा गया। यमुना की बाढ़ और मुगलों के आक्रमण से मंदिर को नुकसान हुआ। सन 1924 की बाढ़ में यह मंदिर तबाह हुआ तो वृंदावन के सेठ हरगुलाल ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

राधा ने 11 महीने बाद कृष्ण को देखकर खोली थीं आंखें
बताते हैं कि राधाजी अपने सखा श्रीकृष्ण से करीब साढ़े ग्यारह महीने बड़ी थीं। लेकिन उन्होंने नेत्र नहीं खोले थे। रावल से लगभग 8 किमी दूर गोकुल में जब कन्हैया ने जन्म लिया तो नंदोत्सव में बधाई देने गए गोप वृषभानु और माता कीर्ति उन्हें भी साथ ले गए थे। तब राधाजी घुटनों के बल श्याम सुंदर के पालने तक पहुंच गईं। तब श्रीकृष्ण को नजर भर देखते ही राधाजी ने पहली बार आंखें खोली थीं।

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