भोपाल में तीन माह के शावक की गई जान: सिसकियों का दर्द- मां ने छोड़ा, क्योंकि मैं कमजोर था, जंगल पर राज करने लायक नहीं था


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भोपालएक घंटा पहले

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बाघ को इंजेक्शन देकर होश में लाने की कोशिश करती वन विहार के डॉक्टरों की टीम। फिर भी उसे होश नहीं आया।

  • भटककर कोलार फिल्टर प्लांट पहुंचा बाघ का तीन महीने का शावक, यहीं तड़पकर गई जान

तस्वीर भोपाल में वीरपुर के जंगल में बने कोलार फिल्टर प्लांट की है, जहां गुरुवार सुबह 11 बजे बाघ का एक तीन माह का शावक बेहोश मिला। जंगल के राजा का ये बेटा मां से छूटकर भटकते हुए यहां पहुंचा था। सुबह जब प्लांट के कर्मचारियों ने इसे देखा तो क्षेत्र में दहशत फैल गई।

तत्काल वन विभाग को सूचना दी गई। लेकिन, जब विभाग की टीम ने इसे देखा तो उन्होंने ट्रेंक्यूलाइज किए बिना ही इसे रेक्स्यू कर लिया, क्योंकि शावक की हालत ऐसी नहीं थी कि इस पर थोड़ी सी भी जोर-जबरदस्ती की जा सके। उसकी त्वचा हडि्डयों से चिपक गई थी। पेट पूरी तरह खाली था।

तय हुआ कि इसे तुरंत ही वन विहार ले जाएं, ताकि इलाज मिल सके। वन विहार से डॉ. अतुल गुप्ता और उनकी टीम पहुंची, जिसने शावक को ऑक्सीजन सपोर्ट देकर गाड़ी में रखा, लेकिन शावक की सांसें बीच रास्ते ही टूट गईं और वो चल बसा। उसकी बॉडी के पोस्टमार्टम में पता चला कि शावक करीब दस दिन से भूखा था।

शरीर में जो भी वसा था, वो खत्म हो चुका था। भूख से तड़पकर उसकी मौत हो गई। बांधवगढ़ नेशनल पार्क के पूर्व डायरेक्टर मृदुल पाठक बताते हैं कि बाघिन छह माह तक शावकों को दूध पिलाती है। फिर उन्हें शिकार का मुलायम हिस्सा खाने देती है।

जंगल का अपना नियम है, जो सबसे ज्यादा फिट, वही मां के साथ रहता है। शायद ये शावक जन्म से ही कमजोर था, इसलिए तीन महीने में ही मां ने इसे छोड़ दिया। वह ठीक से खाना भी नहीं जानता था, क्योंकि मां का दूध ही उसे जीवन दे सकता था, लेकिन मां ने शायद उसे कभी ठीक से दूध पिलाया ही नहीं। वह अकेला भटक रहा था, जीवन की तलाश में, लेकिन भूख ने उसे मौत दे दी।

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