मेघालय से ग्राउंड रिपोर्ट: चूना पत्थर खनन से नष्ट हो रहीं करोड़ों साल पुरानी गुफाएं, प्रदूषण से नदियों का रंग भी बदलने लगा


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शिलॉन्गएक दिन पहलेलेखक: दिलीप शर्मा

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पर्यावरण वैज्ञानिकों ने बताया कि अधिकांश मापदंडों के संबंध में चूना पत्थर खनन से क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट आई है।

  • मेघालय में लगभग 1700 गुफाएं हैं, ज्यादातर चूना पत्थर की हैं
  • करोड़ों साल पुरानी ये गुफाएं 3519 किमी में फैली हुई हैं

मेघालय को प्रकृति से वरदान स्वरूप लगभग 1700 से ज्यादा चूना पत्थर की खूबसूरत गुफाएं मिली हुई हैं। ये विश्व प्रसिद्ध गुफाएं लगभग 3519 किमी में फैली हैं। बलुआ पत्थरों (सैंडस्टोन) वाली विश्व की सबसे लंबी गुफा भी यहीं है। पिछले कई सालों से सीमेंट कंपनियों का विनाशकारी चूना पत्थर खनन इन गुफाओं और पर्यावरण के लिए अभिशाप बन गया है।

मेघालय में बीते 29 साल से इन गुफाओं की खोज पर ब्रायन डेली काम कर रहे हैं। उनका आरोप है कि खनन से चार खूबसूरत गुफाएं पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि सीमेंट कारखानों से निकले रिसाइकिल न होने वाले कचरे की वजह से सर्दियों में यहां की लुखा नदी का पानी ‘डीप ब्लू’ (गाढ़ा नीला) हो जाता है।

मेघालय के पर्यावरण वैज्ञानिकों ने पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले में सीमेंट कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जा रहे चूना पत्थर खनन एक ताजा रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में पर्यावरण और पारिस्थितिक पर खतरनाक प्रभाव की बात सामने आई है। मार्टिन लूथर क्रिश्चियन विश्वविद्यालय के डॉ. आर यूजीन लामारे और नॉर्थ-ईस्टर्न हिल्स यूनिवर्सिटी में पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रोफेसर ओपी सिंह ने अपने एक शोध पत्र में मेघालय के लाइमस्टोन माइनिंग क्षेत्र में मिट्टी की गुणवत्ता में बदलाव की बात का उल्लेख किया है।

नेचर एन्वायरमेंट एंड पॉल्यूशन टेक्नोलॉजी नामक एक अंतरराष्ट्रीय त्रैमासिक वैज्ञानिक पत्रिका में ‘चेंजेस इन सॉइल क्वालिटी इन लाइमस्टोन माइनिंग एरिया ऑफ मेघालय, इंडिया’ में चूना पत्थर खनन गतिविधियों को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इसमें खनन से वनों की कटाई, जैव विविधता के नुकसान, जल की गुणवत्ता और उपलब्धता, ध्वनि प्रदूषण, लैंडस्केप गड़बड़ी, मिट्टी और भूमि के क्षरण आदि जैसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की बात कही है।

शोध पत्र में पर्यावरण वैज्ञानिकों ने बताया कि अधिकांश मापदंडों के संबंध में चूना पत्थर खनन से क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट आई है। मिट्टी के नमूनों में नमी की मात्रा, जल धारण क्षमता, जैविक कार्बन और कुल नाइट्रोजन सामग्री में उल्लेखनीय कमी आई है। पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले में आठ से अधिक सीमेंट प्लांट लगे हुए हैं और खनन साल दर साल बढ़ रहा है।

नदियों में प्रदूषण के लिए सीमेंट कंपनियां जिम्मेदार
मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले के लोग चंद्र और लुखा नदी को प्रदूषित करने के लिए सीमेंट कंपनियों को दोषी मानते हैं। उत्तराखंड में तबाही के बाद पर्यावरणविदों ने मेघालय में अवैध तरीके से किए जा रहें लाइमस्टोन माइनिंग पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

डॉ. लामारे कहते हैं, चूना पत्थर खनन का लगातार बढ़ना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कारण यहां के पर्यावरण में कोई सुधार नहीं हो रहा है। मेघालय के खासी छात्र संघ ने और मेघालय विधानसभा की पर्यावरण कमेटी ने भी लुखा नदी के बदलते रंग पर तत्काल वैज्ञानिक अध्ययन की मांग की है।

उत्तराखंड के बाद कश्मीर के लोग भी दहशत में (श्रीनगर से मुदस्सिर कुल्लू की रिपोर्ट)

उत्तराखंड त्रासदी के बाद जम्मू-कश्मीर के लोग भी दहशत में हैं। खासतौर से हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के आसपास रहने वाले लोगों के मन में डर है कि चमोली की तरह यहां भी पहाड़, ग्लेशियर और डैम आपदा बनकर फट न पड़ें। जम्मू-कश्मीर में भी बड़ी संख्या में बांध बनाकर हाइड्रो प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जिनसे देशभर में बिजली सप्लाई होती है। राज्य में 20 हजार मेगावाट हाइड्रोपावर बनाने की क्षमता है।

फिलहाल 3500 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा के नजदीक 330 मेगावाट क्षमता वाला किशनगंगा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट है। बांदीपोरा के बिलाल अहमद कहते हैं, बांध का जलभराव क्षेत्र करीब 4 किमी एरिया में है और यह अधिकतम सीमा तक भर चुका है।

कम से कम चार गांव-कंजलन, जालिनपोरा, चुन्तीपोरा और गुलशनपोरा इसके आसपास मैदानी इलाकों में हैं। इस इलाके में अक्सर भूकंप आता रहता है। बिलाल कहते हैं कि हम हमेशा इस डर के साये में रहते हैं कि अगर बांध टूटा तो ये गांव तबाह हो जाएंगे। उत्तराखंड त्रासदी के बाद हमारा डर और बढ़ गया है।

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