ये तो पॉजिटिव साइन है: कोविड की हिस्ट्री नहीं फिर भी 20% बच्चों में एंटीबॉडी मिलीं, पटना AIIMS में कोवैक्सिन का ट्रायल करते समय पता चला


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पटना7 मिनट पहले

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पटना AIIMS के डीन डॉ. उमेश भदानी का कहना है कि जिन बच्चों में एंटीबॉडी मिली है, उनकी कोरोना की कोई हिस्ट्री नहीं है। घर में भी कोरोना की कोई हिस्ट्री नहीं है।

कोरोना की तीसरी लहर से बच्चों के ज्यादा प्रभावित होने की आशंका के बीच पटना AIIMS में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। वैक्सीन ट्रायल के दौरान 20% बच्चे ऐसे पाए गए हैं, जिनमें एंटीबॉडी डेवलप हो चुकी है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन बच्चों की कोरोना की कोई हिस्ट्री नहीं है। ऐसे में अगर बच्चों में एंटीबॉडी का आंकड़ा यही रहा, तो तीसरी लहर इनके लिए उतनी खतरनाक नहीं होगी, जितनी आशंका जताई जा रही है।

बच्चों पर कोवैक्सिन का ट्रायल चल रहा
कोरोना की तीसरी लहर में बच्चों के खतरे को देखते हुए ICMR ने बच्चों पर वैक्सीन का ट्रायल की मंजूरी दी है। इसके बाद देश के 8 सेंटरों पर भारत बायोटेक की कोरोना वैक्सीन कोवैक्सिन का बच्चों पर ट्रायल किया जा रहा है। पटना AIIMS भी उन सेंटर्स में शामिल है। यहां चल रहे ट्रायल की निगरानी करने वाले डॉ. सीएम सिंह का कहना है कि अब तक फर्स्ट फेज में 12 से 18 साल के 27 बच्चों पर ट्रायल किया जा रहा है।

वैक्सीन के ट्रायल में बच्चों में मिली एंटीबॉडी
पटना AIIMS के डीन डॉ. उमेश भदानी का कहना है कि देश में बच्चों वाली वैक्सीन का ट्रायल तेजी से चल रहा है। बच्चों में वैक्सीन का ट्रायल करने के पहले बच्चों की जांच की जाती है। इसमें RT-PCR के साथ खून की जांच भी शामिल है। ट्रायल के पहले फेज में 12 से 18 साल तक के बच्चों पर ट्रायल किया गया। इसमें आए बच्चों की जब कोरोना जांच की गई तो वह निगेटिव आई, लेकिन एंटीबॉडी पाई गई। उन्होंने बताया कि वैक्सीन ट्रायल के पहले हुई खून की जांच में 20% बच्चों में एंटीबॉडी पाई गई।

जिनमें एंटीबॉडी मिली, उन्हें पता भी नहीं कब हुआ कोरोना
डॉ. भदानी ने बताया कि जिन बच्चों में एंटीबॉडी मिली है, उनकी कोरोना की कोई हिस्ट्री नहीं है। घर में भी कोरोना की कोई हिस्ट्री नहीं है, क्योंकि वैक्सीन का ट्रायल करने के पहले संबंधित बच्चे और पेरेंट्स की हिस्ट्री खंगाली जाती है। बच्चों को कोरोना कब हुआ और कब ठीक हो गया, उन्हें भी नहीं पता चला। परिवार को भी इसकी जानकारी नहीं हुई।

क्या है एंटीबॉडी

  • नालंदा मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार का कहना है कि वायरस के अटैक को रोकने के लिए शरीर में तैयार हुई प्रतिरोधक क्षमता ही एंटीबॉडी है। एंटीबॉडी तब बनती है जब वायरस शरीर में जाता है। ऐसी स्थिति में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता वायरस से लड़ती है, उसे मारती है।
  • उन्होंने बताया कि इस दौरान प्रतिरोधक क्षमता दो तरह से लड़ती है। एक सेल्युलर इम्यूनिटी और एक ह्यूमोरल इम्युनिटी। ह्यूमोरल जब लड़ती है, तो एंटीबॉडी बनती है। इस दौरान अन्य तरह की प्रतिरोधक क्षमता भी तैयार होती है। इसके बाद अगली बार जब वह वायरस अटैक करेगा तो एंटीबॉडी और अन्य सेल्युलर इम्युनिटी वायरस से शरीर को बचाती है। अगर किसी व्यक्ति में वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी तैयार है, तो वह उस वायरस के अटैक से शरीर को पूरी तरह सुरक्षित रखने का काम करेगा।

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