लॉकडाउन का एक साल: मुश्किल से लौटी हंसी, इसे सहेजिए; खतरा अभी टला नहीं, आपका संयम ही कोरोना की जंग में दिलाएगा जीत


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2 मिनट पहले

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दिल्ली बॉर्डर पर रामपुकार की रोती-बिलखती तस्वीर लॉकडाउन की त्रासदी का चेहरा बन गई थी। प्रशासन ने उन्हें बेगूसराय जिले के बरियारपुर गांव पहुंचा। अब वे अपने परिवार के साथ खुश हैं।

कोरोना महामारी के खिलाफ सामूहिक लड़ाई की शुरुआत देश ने 25 मार्च, 2020 को लॉकडाउन से ही की थी। गुरुवार को इसका एक साल पूरा हो रहा है। इस दौरान हमने दर्द के पहाड़ लांघे, संकटों के समुद्र नापे और बेबसी के घने अंधेरे में भी उम्मीदों का दीया जलाए रखा। हमारी इच्छाशक्ति ने अजेय दिख रही महामारी को घुटनों पर ला दिया। दुनिया में वैक्सीन के रूप में आईं उम्मीदों की सुबह के बीच आइए याद करते हैं उस मुश्किल वक्त को…मगर यह मत भूलिए कि खतरा अभी टला नहीं है। फिर आपका संयम ही महामारी के खिलाफ जंग में जीत दिलाएगा।

संकट में अपनों के बीच पहुंचकर ही सुकून मिला

बेगूसराय: दिल्ली बॉर्डर पर रामपुकार की रोती-बिलखती तस्वीर लॉकडाउन की त्रासदी का चेहरा बन गई थी। प्रशासन ने उन्हें बेगूसराय जिले के बरियारपुर गांव (बिहार) भेजा। तब से रामपुकार अपने गांव में ही हैं। तीन बेटियों के पिता रामपुकार कहते हैं, अब मैं कभी दिल्ली नहीं जाऊंगा। गांव में ही मजदूरी कर गुजर-बसर कर लूंगा।

उन दिनों को याद करते हुए रामपुकार कहते हैं, मेरे पास कोई काम नहीं था। हाथ में पैसे भी नहीं बचे थे। रहने-खाने का भी ठिकाना नहीं था। आंखों के सामने दुनिया खत्म हो रही है। कुछ दिन पहले ही बेटे को खोया था। ऐसे में मैं हर सूरत में पत्नी व बेटियों के पास पहुंचना चाहता था। जब कोई रास्ता नहीं सूझा तो साथियों के साथ पैदल ही घर के लिए निकल पड़ा। पुलिस ने रोका तो मेरे आंसू नहीं रुके।

दूरी की तस्वीर अब खिलखिलाहटों में बदली मगर सतर्कता जरूरी

इंदौर: मध्य प्रदेश के इंदौर की ये तस्वीर कोरोनाकाल में पिता के संयम और मासूम बचपन की बेबसी का चेहरा बन गई थी। पिता तुकोगंज थाना के प्रभारी निर्मल श्रीवास लॉकडाउन के दौरान ड्यूटी कर रहे थे। घर के बाहर खाना खाते श्रीवास और दरवाजे पर मायूस खड़ी बेटी की आंखों में हुए संवाद ने लोगों की पलकें नम कर दी थीं। एक साल बीत चुका है, स्थितियां वैसी नहीं रह गई हैं।

अब श्रीवास परिवार को समय भी दे पाते हैं…बेटियों के चेहरे पर हंसी भी लौट आई है। मगर श्रीवास कहते हैं कि कोरोनाकाल का संयम अब भी कायम है। बाहर से लौटकर पहले खुद को सैनिटाइज करते हैं उसके बाद ही परिवार के पास आते हैं। कहते हैं-हालात बेहतर हैं, पर खतरा अभी टला नहीं है। जब तक महामारी खत्म नहीं हो जाती, हमें संयम तो रखना ही होगा।

विशेषज्ञों से जानें कल के सबक व भविष्य के सवालों के जवाब

बीते कल के 12 सबक: इस दौर में हमने पहचानी परिवार की असली ताकत

1. प्रकृति सर्वशक्तिमान : हमने जाना कि प्रकृति पर किसी का वश नहीं। त्रासदी ने साफ हवा, पानी की जरूरत भी समझाई।
2. परिवार सबसे बड़ी ताकत : मुश्किल कितनी भी बड़ी हो, परिवार साथ हो तो हर समस्या का हल निकलना संभव है।

3. स्वास्थ्य सबसे बड़ी पूंजी : कोरोना ने सिखाया कि सेहत सबसे जरूरी है। जो स्वस्थ है वही बीमारी से लड़ेगा।

4. मजबूत इच्छाशक्ति : वैक्सीन के आने तक महामारी से लड़ाई में सरकार-समाज की इच्छाशक्ति ही काम आई।

5. संयम से समाधान : लॉकडाउन में संयम महामारी के खिलाफ बड़ा हथियार था। आगे भी यही काम आएगा। जान है तो जहान है।

6. अनुशासन से जीत : साफ-सफाई हो या दो गज की दूरी… ऐसे अनुशासित तौर-तरीकों से ही स्थिति बिगड़ने से बची।

7. कल नहीं, आज में जीना : अक्सर हम कल की चिंता में आज को जीना भूल जाते हैं। हमने सीखा कि आज को जीना है जरूरी।

8. मुश्किल में भी खुशी की तलाश : लॉकडाउन में छोटी-छोटी चीजों में भी खुशियां तलाशीं। हमारा नजरिया बदला।

9. हम समाज का हिस्सा : मुश्किल में सामाजिक ताने-बाने की भूमिका अहम है। एकजुट समाज संकट को हराता है।

10. सबका सम्मान : डॉक्टर-पुलिस ही नहीं सफाईकर्मी का भी सम्मान करना सीखा। सबका महत्व है, कोई भी काम छोटा नहीं।

11. बचत है जरूरी : पैसा खुशियां नहीं खरीद सकता, लेकिन मुसीबत में काम जरूर आता है। हमने बचत का महत्व जाना।

12. विज्ञान पर भरोसा : वायरस से असली लड़ाई वैज्ञानिकों ने लड़ी। पहली बार वैक्सीन इतने कम समय में बनी।

ये भविष्य के 9 सवाल: वैक्सीन का मतलब कोरोना का खात्मा नहीं, फैलाव घटेगा

Q. कोरोना कब खत्म होगा? क्या मास्क हमेशा पहनना होगा?
वैक्सीन का मतलब कोरोना खत्म होना नहीं, सिर्फ फैलाव कम होगा। हो सकता है कि नए स्ट्रेन आएंं व वैक्सीन अपडेट होती जाए। कुछ साल तो मास्क पहनना ही पड़ेगा।

Q. डिजिटलाइजेशन की वजह से क्या साइबर खतरा और बढ़ेगा?
सावधानी जरूरी है। केवल हमारा डेटा लीक करने या बेचने की वजह से अनचाहे कॉल और एसएमएस की संख्या बढ़ गई है। ऐसी प्राेफाइलिंग तो कोरोना से पहले भी थी।

Q. स्कूल-कॉलेज बंद रहे, आगे ई-शिक्षा चलेगी या बदलाव होगा?
ऑफलाइन एजुकेशन की वापसी हो रही है। ऑनलाइन एजुकेशन क्लासरूम का विकल्प नहीं हो सकती है। बच्चाें के ओवरआल डेवलपमेंट के लिए आउटडोर एक्टीविटीज बहुत जरूरी हैं।

Q. शिक्षा, इलाज जैसी चीजें टेक्नोलॉजी के सहारे कब तक?
नहीं, कुछ समय के लिए ऑनलाइन माध्यम अपनाए गए, लेकिन ऑफलाइन मार्केट बहुत समृद्ध है। ऑनलाइन का चलन तो वैसे भी बढ़ रहा था लेकिन ऑफलाइन मार्केट आगे मजबूत होगा।

Q. कोरोनाकाल में लाइफ स्टाइल और कितनी बदलेगी?
हाथ धोना जैसे आदत बना है, वैसे ही खान-पान की आदतें भी बदलेंगी। जो सक्षम हैं वे ऑर्गेनिक प्रोडक्ट पर शिफ्ट होंगे। बैलेंस्ड खान-पान और घर पर ही व्यायाम का इंतजाम अब आम होगा।

Q. पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बदलाव आएगा या पर्सनल व्हीकल बढ़ेंगे?
कोविड के बाद निजी वाहनों की खरीद बढ़ी है। इसलिए पर्सनल व्हीकल तो बढ़ेंगे, लेकिन लंबी दूरी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की उपयोगिता कम नहीं होगी। खासकर एयर कनेक्टििवटी बेहतर होगी।

Q. स्वास्थ्य सुविधाएं और बेहतर बनाने के लिए क्या करना होगा?
कोविड काल में दूसरी बीमारियों की जगह सिर्फ कोविड का उपचार हुआ। स्वास्थ्य सुविधाएं 60% निजी सेक्टर पर निर्भर हैं। कमजोरियां उजागर हुई हैं, ऐसे में मजबूती पर काम होगा।

Q. पार्क-सिनेमा बंद रहे। मनोरंजन क्या मोबाइल पर सिमट जाएगा?
लाइव एंटरटेनमेंट का रुझान कम नहीं होगा। रियायतें मिलने के बाद क्लबों और सिनेमाघरों में क्षमता से ज्यादा लोग पहुंचने लगे हैं। हालांकि ओटीटी और मोबाइल जैसे नए तरीके भी जारी रहेंगे।

Q. लॉकडाउन में रोजगार खूब गए, कमाई के नए रास्ते कैसे खुलेंगे?
कोरोनाकाल में स्वरोजगार के कई उदाहरण दिखे हैं, यह ट्रेंड बढ़ेगा। एग्री-फूड प्रोसेिसंग का एक्सपोर्ट, हेल्थ व शिक्षा सेक्टर लोगों को खुद का व्यवसाय देने के साथ रोजगार पैदा करेंगे।

भास्कर एक्सपर्ट पैनल-

  • एसपी शर्मा, चीफ इकॉनामिस्ट पीएचडी चेम्बर ऑफ कॉमर्स
  • डॉ श्रीनिवास गोली, रिसर्चर, यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न पर्थ ऑस्ट्रेलिया
  • रीतेश भाटिया, साइबर एक्सपर्ट
  • हिमांशु ठक्कर, समाजशास्त्री
  • जितेंद्र दुबे, एक्सपर्ट, रोड ट्रांसपोर्ट
  • अशोक अग्रवाल, शिक्षाविद/आरटीई एक्टीविस्ट

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