संजय राउत से बातचीत: कांग्रेस महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव अकेले लड़ना चाहती है तो मैं उसका आत्मविश्वास नहीं तोड़ूंगा, लेकिन उसे केरल और असम के नतीजे नहीं भूलने चाहिए


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11 मिनट पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बीच पिछले दिनों हुई मुलाकात के बाद कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। शिवसेना के राज्यसभा सदस्य और पार्टी के मुखपत्र सामना के संपादक संजय राउत इसे सामान्य मुलाकात बताते हैं। दैनिक भास्कर ने इस मुलाकात के अलावा महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े कई सवाल संजय राउत के सामने रखे। पढ़िए, इस बातचीत के खास हिस्से…

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में हुई मुलाकात के क्या मायने हैं? क्या कुछ नए सियासी समीकरण बन रहे हैं?
राजनीति अपनी जगह है और रिश्ते अपनी जगह। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हमारा पुराना और इमोशनल रिश्ता है। पॉलिटिकल रिश्ता टूटा है, व्यक्तिगत नहीं। वैसे भी किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री से मुलाकातें करनी चाहिए। केंद्र के साथ मजबूत और अच्छा रिश्ता बनाकर रखने की महाराष्ट्र में परंपरा रही है।

राजनीति में बहुत से ऐसे मुद्दे होते हैं जहां राज्य को केंद्र की मदद की जरूरत पड़ती है। इस मुलाकात के बहुत ज्यादा राजनीतिक मायने निकालने की जगह यह समझना चाहिए कि एक राज्य का मुख्यमंत्री देश के प्रधानमंत्री से मिला और मेरा ख्याल है कि उसे मिलना ही चाहिए।

आपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की। इसके कुछ राजनीतिक मायने हैं या यह भी आपके निजी विचार थे?
देखिए, प्रधानमंत्री किसी पार्टी के नहीं हैं। यह एक संवैधानिक पद है। इस पद का हमें आदर करना चाहिए। पीएम के साथ बैठना, मुलाकात करना गर्व की बात है। हमने तो उनकी कई बार तारीफ की। हमारा प्रहार हमेशा पॉलिसी पर होता है, उन पर नहीं।

कोविड के दौरान कई राज्यों ने केंद्र पर गैर भाजपा शासित राज्यों से भेदभाव करने का आरोप लगयाा। महाराष्ट्र के साथ भी ऐसा रहा या उसे केंद्र से जरूरी मदद मिली?
केंद्र ने शुरुआत में कुछ गलतियां कीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहा है। फिर बाद में गलतियां सुधारीं या कहें सुधार की तरफ हैं। रही बात महाराष्ट्र को मदद मिलने की तो स्पष्ट रूप से उतनी मदद नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी।

अभी हमारे GST रिटर्न का पैसा भी हमें नहीं मिला। ताजा मुलाकात में भी राज्य के मुख्यमंत्री ने इस पर चर्चा की। करीब 30 हजार करोड़ की रकम हमें मिल जाती तो कोविड काल में बहुत बड़ी मदद होती। लेकिन, मैं फिर कहूंगा कि प्रश्न राज्य के विकास और जनता का है। पीएम हम सबके हैं। केंद्र भी सबका है। केंद्र का दायित्व है कि वह राज्यों की मदद करे। राज्य का अधिकार है कि वह केंद्र से मदद मांगे।

प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पीएम की बैठक को लगातार बायकॉट करती रहीं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पीएम पर निशाना साधते रहे, बाकी राज्यों ने भी खूब आलोचना की। अगर केंद्र मदद नहीं कर रहा तो खुलकर विरोध करने में हर्ज क्या है?
मैंने कब कहा हर्ज है। मैं तो यह कह रहा हूं कि केंद्र के साथ तालमेल बैठाने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि राज्य और केंद्र की लड़ाई में राज्य की जनता का नुकसान होता है। अभी तो ऐसा समय बिल्कुल नहीं है कि हम लड़ाई में वक्त गंवाएं, बल्कि केंद्र से बातचीत कर अपने राज्य को सुरक्षित करना ही हमारी प्राथमिकता में है। बाकी मैं किसी राज्य के बारे में कोई कमेंट नहीं करुंगा।

शरद पवार और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बैठक की, काफी देर बात हुई। क्या कुछ पक रहा है?
शरद पवार को मैं करीब से जानता हूं। वे हर उस व्यक्ति से मिलते हैं, जिसके बारे में उन्हें लगता है कि वह कुछ जानकारी रखता है, प्रशांत किशोर में प्रतिभा है। वह किसी पॉलिटिकल पार्टी के मुखिया नहीं हैं। वे चुनावी रणनीति बनाने वाली एक कंपनी के मुखिया हैं। उन्हें कई राज्यों में सफलता भी मिली। मुझे नहीं लगता कुछ खास पक रहा है। पवार राजनेता हैं, हमेशा राजनीति में आए बदलाव, नए तरीकों के बारे में सोचते और विचारते रहते हैं। इस मुलाकात में भी कुछ यही हुआ होगा।

महाराष्ट्र नव निर्माण सेना प्रमुख राज और उद्धव ठाकरे की पार्टियां क्या कभी हाथ मिलाएंगी? राज ठाकरे ने इस सवाल के जवाब में एक इंटरव्यू में कहा था- गॉड नोज (भगवान ही जानता है)?
देखिए, भगवान तो संसद का सदस्य है नहीं, किसी पार्टी का नेता भी नहीं, जो दो पार्टियों के बीच बातचीत कराएगा। मुझे नहीं लगता कि यह कभी होगा। राज्य में कई पार्टियां होती हैं। उन्हें भी हक है कि वह राज्य में राजनीति करें।

कांग्रेस कह रही है कि अब वह महाराष्ट्र में स्थानीय और लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी, ऐसा क्यों?
अगर कांग्रेस को लगता है कि वह इतनी ताकतवर हो गई है कि लोकसभा चुनाव में मोदी का सामना अकेले कर सकती है तो मैं उनका आत्मविश्वास नहीं तोड़ना चाहूंगा। कांग्रेस के नेताओं को अगर लगता है कि उनका पीएम बन सकता है तो बिल्कुल वह अपना आत्मविश्वास बनाकर रखें। लेकिन बंगाल, केरल और असम के ताजा चुनाव में अपने नतीजों पर एक बार इंट्रोस्पेक्शन जरूर करना चाहिए। रही बात, महाराष्ट्र की तो साफ है कि यहां उद्धव ठाकरे पूरा कार्यकाल होने तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे।

‘सामना’ के हाल के एक संपादकीय में भी राज्यों के चुनाव नतीजों पर कांग्रेस को मंथन का सुझाव दिया गया था। क्या ‘सामना’ कभी अपनी पार्टी की आलोचना भी करता है?
बिल्कुल, सामना चर्चित ही इसीलिए है क्योंकि हम उसमें अपने मन की बात करते हैं। हमें जो ठीक लगता है वह लिखते हैं। आप पिछले अंकों को खंगालेंगी तो आपको मिल जाएगा कि हमने अपने नेताओं की भी आलोचना की और सुझाव दिए।

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