सावधानी ही बचाव: साइनस और आंखों के पास तक अगर पहुंच गया है ब्लैक फंगस तो इंजेक्शन के साथ ऑपरेशन भी जरूरी


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ग्वालियर7 घंटे पहलेलेखक: अभिषेक द्विवेदी

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म्यूकोरमाइकोसिस यानी ब्लैक फंगस के मरीजों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। ब्लैक फंगस अगर रोगी के साइनस से होते हुए आंख के पास तक पहुंच गया है तो ऑपरेशन कर साइनस से इंफेक्शन हटाने के साथ ही एम्फोटेरिसिन बी लाइपो जोमल इंजेक्शन देना पड़ता है। इससे रोगी की आंख बच सकती है।

अगर ब्लैक फंगस की समय रहते पहचान नहीं हुई और वह आंख तक पहुंच गया है तो आंख निकालनी भी पड़ सकती है। अगर इंफेक्शन दिमाग तक चला जाए तो रोगी की जान भी जा सकती है। ब्लैक फंगस का बहुत शुरुआत में ही पता चल जाए तो ऑपरेशन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड मरीजाें को ब्लैक फंगस न हो इसके लिए उसे स्टेरॉयड कम से कम दिया जाएं तथा उसकी शुगर कंट्रोल रखी जाए।

एम्फोटेरिसिन बी इंजेक्शन के भी हैं साइड इफेक्ट इसलिए किडनी, लिवर की जांच अवश्य कराएं
आईएमए ग्वालियर के अध्यक्ष व वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप राठौर का कहना है कि अगर रोगी में इंफेक्शन साइनस तक आ गया है तो इंजेक्शन लगाने के साथ ही ऑपरेशन कर साइनस से इंफेक्शन निकाला जाए तो रोगी न केवल ठीक हो सकता है बल्कि उसकी आंख भी बच जाएगी। किसी रोगी में लगातार 20 दिन से इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं तो उसे साइड इफेक्ट आ सकता है। इंजेक्शन से लिविर, किडनी के साथ उसके सुनने की क्षमता पर भी असर आ सकता है। इसलिए इंजेक्शन लगाने के पांचवें दिन से यह जांच करानी चाहिए कि कहीं कोई साइड इफेक्ट तो नहीं हो रहा है।

फंगल इंफेक्शन से जूझ रहे नवजात को मिले इंजेक्शन: निजी अस्पताल में भर्ती माधौगंज निवासी अनूप शुक्ला के नवजात शिशु के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एंफोटेरेसिन-बी के 5 इंजेक्शन उपलब्ध कराए। यह जानकारी सीएमएचओ डॉ. मनीष शर्मा ने दी।

जेएएच: सर्जरी वार्ड में शिफ्ट किए मरीज… ब्लैक फंगस के लिए जेएएच के ईएनटी के 12 बिस्तर का वार्ड फुल हो गया। अब 40 बेड के सर्जरी वार्ड को नया वार्ड बनाया है। वहीं जिला अस्पताल में भी फंगस वार्ड बनाया जाएगा।

डॉक्टर बोले; यूरिया, क्रेटनाइन की जांच से पता चलता है साइड इफेक्ट

अकेले इंजेक्शन से मरीज का इलाज मुश्किल
^अगर फंगस है तो ऑपरेशन कर उसे हटाया जाता है। फंगस साइनस के जितने भाग को नुकसान पहुंचा चुका होता है उसे ऑपरेशन से हटाना जरूरी होता है। बिना ऑपरेशन किए अकेले इंजेक्शन से मरीज के ठीक होने की संभावना बहुत कम है।
-डॉ. अमित रघुवंशी, ईएनटी विशेषज्ञ, जिला अस्पताल मुरार

दो मरीजों में हल्की घबराहट हुई थी
^जयारोग्य अस्पताल के ब्लैक फंगस वार्ड में 12 मरीज भर्ती हैं। इनमें से 10 मरीजों को एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन दे रहे हैं। दो मरीज में हल्की घबराहट की शिकायत हुई थी,जो बाद में ठीक हो गई। इस इंजेक्शन पर प्रयोग आमतौर पर नहीं होता है।
-डॉ.वीपी नार्वे, विभागाध्यक्ष, ईएनटी जीआरएमसी

ऑपरेशन से फंगल लोड कम होता है
^ब्लैक फंगस के केस में अकेले इंजेक्शन से मरीज पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता है। उसकी जगह पोसापोनाजॉल इंजेक्शन प्रयोग कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि फंगल का लोड कम करने के लिए पहले ऑपरेशन जरूरी है।
-डॉ. अभिनव शर्मा, वरिष्ठ सर्जन

इंजेक्शन का लिवर व किडनी पर प्रभाव
^एम्फोटेरिसिन-बी लाइपोजोमल इंजेक्शन का असर लिवर व किडनी पर पड़ता है। इसका पता करने के लिए यूरिया, क्रेटनाइन और लिवर एंग्जाइम की जांच हर तीन दिन में करते हैं। फंगस का प्रारंभिक स्टेज पर पता चल जाए तो बिना ऑपरेशन के इंजेक्शन से मरीज ठीक हो सकती है।
-डॉ. पुरेंद्र भसीन, वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ

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