सुप्रीम सुनवाई: जो कानून अंग्रेजों ने गांधी-तिलक के खिलाफ इस्तेमाल किया, उसकी अब क्या जरूरत है?


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22 मिनट पहलेलेखक: पवन कुमार

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एनवी रमना की पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा- ‘जिस राजद्रोह कानून का इस्तेमाल अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को दबाने के लिए किया।

  • राजद्रोह कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार से सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124-ए (राजद्रोह कानून) के दुरुपयोग और इस पर किसी की जवाबदेही न होने पर चिंता जताई है। इस ‘औपनिवेशिक काल’ के कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) एनवी रमना की पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा, ‘जिस राजद्रोह कानून का इस्तेमाल अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को दबाने के लिए किया, क्या आजादी के 75 साल बाद भी उसे जारी रखना जरूरी है?’

कोर्ट ने कहा, ‘अंग्रेजों ने इस कानून का इस्तेमाल महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को चुप कराने के लिए किया था। अभी के आंकड़े देखे जाएं तो इसके तहत दोषी ठहराए जाने की दर कम है। ऐसे में क्या आजादी के 75 साल बाद भी सरकार को इसकी जरूरत लगती है? ऐसे कानूनों को जारी रखना दुर्भाग्यपूर्ण है।

बड़े पैमाने पर कानून के दुरुपयोग के मामले आ रहे हैं। किसी की जवाबदेही तक नहीं तय है। सरकार कई पुराने कानून हटा चुकी है। लेकिन इस पर गौर नहीं किया गया।’ कोर्ट में मेजर जनरल (रिटायर्ड) एसजी बोम्बटकेरे सहित दो अन्य याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने पक्ष रखा।

कोर्ट रूम लाइव: सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66ए भी निरस्त कर दी थी, लेकिन आज भी पुलिस उसमें केस कर रही है

  • वेणुगोपाल: यह याचिका राजनीति से प्रेरित है। इसको मीडिया में प्रचार पाने के लिए दायर किया गया है। इसलिए याचिका को खारिज किया जाना चाहिए।
  • सीजेआई: याचिकाकर्ता ने देश की रक्षा के लिए पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। यह नहीं कह सकते कि मुकदमा किसी से प्रेरित है। इसमें जनहित जुड़ा है।
  • वेणुगोपाल: कानून रद्द करने की बजाय कड़े दिशा-निर्देश देकर भी इसका दुरुपयोग रोका जा सकता है।
  • सीजेआई: दिशा-निर्देश से हल नहीं निकलने वाला। आईटी एक्ट की धारा 66ए को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया। फिर भी देशभर में इस धारा के तहत केस हो रहे हैं। धारा 124-ए की ताकत की तुलना उस आरी से कर सकते हैं, जिससे बढ़ई एक पेड़ काटने की बजाए पूरा जंगल साफ काट रहा हो।

राजद्रोह के कानून में असीम शक्तियां, असहमति की आवाज दबाने का हथियार

सीजेआई ने कहा, राजद्रोह के कानून के तहत शक्तियां इतनी असीम हैं कि एक पुलिस अधिकारी जो किसी को ताश और जुए के अपराध में पकड़ता है, उस पर भी राजद्रोह की धारा लगा सकता है। स्थिति इतनी गंभीर है कि अगर कोई राज्य या दल असहमति की आवाज नहीं सुनना चाहता, तो इस कानून का इस्तेमाल ऐसे लोगों के समूहों को फंसाने के लिए करता है। हमारी चिंता कानून के दुरुपयोग और कार्यकारी एजेंसियों की जवाबदेही न होने पर है। इसकी संवैधानिकता परखनी होगी। केंद्र विस्तृत हलफनामा दायर करे।

चर्चित मामले- सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में खारिज कर चुका है राजद्रोह की धारा के तहत केस

  • विनोद दुआ मामला: यू-ट्यूब कार्यक्रम को लेकर दुआ के खिलाफ हिमाचल प्रदेश में 6 मई, 2020 को राजद्रोह का केस दर्ज हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने 3 जून, 2021 को केस खारिज किया।
  • आंध्रप्रदेश के टीवी चैनलों का केस: आंध्र प्रदेश पुलिस ने इसी वर्ष 14 मई को दो तेलुगु चैनलों टीवी5 और एबीएन के खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज किया था। इन पर आरोप लगा कि इन चैनलों के कार्यक्रम के न राज्यसभा सदस्य रघुराम कृष्णन राजू ने राज्य सरकार व मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्‌डी की आलोचना की। चैनलों की याचिका पर सुनवाई कर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई पर रोक लगा दी।
  • पत्रकार किशोरचंद्र का मामला: मणिपुर के पत्रकार वांगखेम को एक सोशल मीडिया पोस्ट के कारण राजद्रोह के आरोप में 2018 में गिरफ्तार किया गया था। हाईकोर्ट ने केस रद्द कर उन्हें जेल से रिहा करने का आदेश दिया था।

राजद्रोह कानून को लेकर लॉ कमीशन की राय अलग-अलग

1. वर्ष 1968 में लॉ कमीशन ने 39वीं रिपोर्ट में राजद्रोह कानून निरस्त करने के विचार को खारिज किया। कमीशन ने कहा था कि कानून बनाए रखना जरूरी है।2. वर्ष 1971 में आयोग ने 42वीं रिपोर्ट में केंद्र को राजद्रोह कानून को व्यापक बनाने का सुझाव दिया।3. 2018 में विधि आयोग ने केंद्र को सुझाव दिया कि धारा 124ए पर फिर से विचार करना चाहिए। आयोग ने सरकार से कहा, इसे निरस्त करना चाहिए।

क्या है राजद्रोह- तीन साल से लेकर उम्रकैद और जुर्माने तक की सजा का प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट के वकील मनीष पाठक ने बताया, आईपीसी की धारा 124ए के तहत अगर कोई व्यक्ति कुछ लिखता, बोलता, या सोशल मीडिया पर सरकार के प्रति आपत्तिजनक पोस्ट डालता है या संकेतों, दृश्य माध्यम से ऐसी बातों का समर्थन करता है जिससे सरकार के प्रति विश्वास कम हो, गुस्सा और असंतोष हो तो वह राजद्रोह है। दोषी पाए जाने पर कम से कम तीन साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा व जुर्माना।

छह साल में 326 केस, 559 लोग गिरफ्तार हुए, पर दोषी केवल 10

एनसीआरबी के डाटा के अनुसार 2014 से 2019 के बीच राजद्रोह के 326 केस हुए, 559 लोग गिरफ्तार हुए। दोषी 10 लोग साबित हुए।

सरकार नहीं चाहती कानून रद्द हो

गृह मंत्रालय ने जुलाई 2019 में एक सवाल के जवाब में राज्यसभा में कहा था, ‘राजद्रोह के अपराध से निपटने वाला प्रावधान खत्म करने का प्रस्ताव नहीं है। राष्ट्रविरोधी, अलगाववादी और आतंकी तत्वों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए प्रावधान बनाए रखने की आवश्यकता है।

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