सेना में शहीदों की वीरांगनाओं के लिए जगह नहीं: सारी परीक्षाएं पास करने के बाद भी नहीं मिली ज्वाइनिंग, संसदीय समिति बोली-वैकेंसी नहीं तो ऑफर क्यों दिया


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10 मिनट पहलेलेखक: मुकेश कौशिक

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संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट में शहीदों की वीरांगनाओं के साथ हो रहे अन्याय का खुलासा हुआ है।

देश के लिए सर्वोच्च बलिदान करने वाले सैनिकों की पत्नियों के साथ कैसा बर्ताव हो रहा है, यह खुलासा संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट से हुआ है। इसमें यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि शहीद विधवा को सेना में नौकरी देने का ऑफर होने और रक्षा सेवाओं से लेकर स्टाफ सलेक्शन बोर्ड के कठिन इम्तिहान पास करने के बावजूद उनमें से कई को नौकरी नहीं दी जा रही है।

कहा जाता है कि वैकेंसी नहीं हैं। संसदीय समिति ने कहा कि सेना में अधिकारियों के स्तर पर अनेक रिक्तियां हैं और ऐसे में शहीदों की उन विधवाओं को नौकरी से वंचित रखना अचंभित करने वाला है। वो भी तब जब उन्होंने परीक्षाएं पास कर ली हैं।

समिति ने कहा कि देश के लिए शहादत दे चुके जवानों की पत्नियां पहले से ही जीवन की अग्नि परीक्षा से गुजर रही होती हैं। उसके साथ ऐसी नाइंसाफी कतई नहीं की जानी चाहिए। समिति ने पूछा है कि वैकेंसी नहीं होती तो शहीद की विधवा को परीक्षा में बैठने की पेशकश ही क्यों की जाती है। शहीद की पत्नी अगर ग्रेजुएट है और आयु 35 साल से कम है तो उन्हें सेना में कमिशन देने की पेशकश की जाती है।

शहीद की पत्नी ने लिखा सेनाध्यक्ष की पत्नी को पत्र: पति की मौत को 100 दिन बीते, पेंशन अब तक दस्तावेजों में ही उलझी

सेना के एक शहीद अफसर की पत्नी ने सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की पत्नी वीणा नरवणे को पत्र लिखा है। इसी महीने लिखे इस पत्र में शहीद की विधवा ने बताया है कि किस तरह उसे दर-दर भटकाया जा रहा है। पत्र में लिखा है कि मेरे पति को गए 100 दिन पूरे हो गए हैं। लेकिन अब भी वह पेंशन के लिए दस्तावेजों की मांग पूरी नहीं कर पाई है।

महिला को पीसीडीए/सीडीए/ एमपी-5, एलपीसी, जैसे दफ्तरों में कागज जमा कराने होते हैं। सैनिक जिला बोर्ड उसे फिजिकली बुलाता है और निशानी अंगूठा लगवाता है। इतना करने के बावजूद पता चलता है कि अभी कोई पेपर बाकी रह गया है।

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