25 मार्च 2020 से 25 मार्च 2021: इंसान घरों में कैद हुए तो आजाद हुई इंसानियत, पढ़िए लॉकडाउन में दूसरों की मदद करने वाली 5 सुपरहिट कहानियां


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3 मिनट पहले

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कोरोना को फैलने से रोकने के लिए 25 मार्च 2020 को लगे लॉकडाउन को आज एक साल हो गया। इस दौरान जब इंसान घरों में कैद हो गए तो उनके भीतर की इंसानियत आजाद हो गई। जो आम आदमी अक्सर किसी हादसे के शिकार लोगों को अनदेखा करते या सिर्फ वीडियो बनाते दिखते थे, वे दूसरों की मदद के लिए आगे आने लगे। इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने साबित किया कि हमारे भीतर दूसरों की ओर हाथ बढ़ाने वाला इंसान अभी जिंदा है।

तो आइए लॉकडाउन के एक बरस पूरा होने पर देश में हुई पांच ऐसी घटनाओं को जानते हैं जो पहली नजर में तो मामूली लगती हैं, मगर इन घटनाओं ने देश के साधारण लोगों के मन में इंसानियत को लेकर आस जगाए रखी…

1-लुटेरों ने 30 हजार के आम लूटे तो मददगारों ने जुटाए 8 लाख रुपए से ज्यादा

उत्तरी दिल्ली के जगतपुरी इलाके में फलों का ठेला लगाने वाले फूल मियां यानी छोटे को तीन दिनों के भीतर आम लोगों के दो एकदम उलट रूप देखने को मिले। पहला चेहरा लुटेरों का और दूसरा ऐसे मददगारों का जो सामने भी नहीं आना चाहते।

घटना 20 मई, 2020 की है। तब देशभर में लॉकडाउन चल रहा था। छोटे के ठेले से थोड़ी दूर कुछ लोग आपस में लड़ने लगे। उनमें से कुछ एक ने उसका ठेला धकेलते हुए वहां से हटने को कहा। छोटे जैसे ही कुछ दूर गया, लोगों की भीड़ ने उसके ठेले के पास ही रखीं आम की कई क्रेट्स लूट लीं। छोटे के मुताबिक उन क्रेट्स में करीब 30 हजार रुपए के आम थे।

सरेराह मची इस लूट का वीडियो वायरल हो गया। इसमें कई लोग अपनी हेलमेट में आम भरकर ले जाते दिखे। कई ड्राइवर अपना ऑटो खड़ा करके आम लूटते भी नजर आए। इस घटना की खबर कुछ न्यूज चैनल्स पर टेलीकास्ट हुई। इन खबरों में लोगों से छोटे की मदद की अपील की गई।

फिर क्या था। देखते ही देखते दो दिनों के भीतर लोगों ने छोटे के बैंक खाते में 8 लाख से ज्यादा रुपए भेज दिए। मदद करने वालों में किसी ने 200 रुपए भेजे तो किसी ने कई हजार। छोटे बोला, जिन्हें लूटना था उन्होंने लूटा, लेकिन मैं इतने सारे लोगों की मदद पाकर बहुत खुश हूं। अब मैं बच्चों के साथ खुशी से ईद मना सकूंगा।

2-रोती तस्वीर देख हिले लोग, सब्जी वाले की दुकान बचाई, कर्ज भी उतारा

लॉकडाउन के चलते मुंबई के अशोक कुमार ने चार महीने बाद 5 अगस्त 2020 को भिंडी बाजार में अपनी सब्जी की दुकान खोली। मगर अफसोस कि तेज बारिश की बाढ़ के चलते कुछ देर में ही उन्हें अपना शटर गिराना पड़ा। बची हुई सब्जी फेंकनी पड़ी।

दो बच्चों के पिता अशोक पैदल ही कुरला में अपने घर की ओर चल पड़े। उनका दिल टूटा हुआ था, आस खत्म हो चुकी थी। ऐसे में वह किंग्स सर्किल के पास डिवाइडर पर बैठकर रोने लगे तो एक अखबार के फोटोग्राफर ने उनकी तस्वीर खींच ली। तस्वीर में अशोक सिर पर रुमाल बांधे और हाथों में अपने जूते लिए बैठे दिख रहे थे।

अगले दिन जैसे ही यह तस्वीर छपी तो मुंबई वालों के दिलों में उतर गई। तमाम लोग उन्हें फोन करने लगे। कुछ ही घंटों में उनके बैंक खाते में करीब 2 लाख रुपए पहुंच गए। मदद करने वालों में से ज्यादातर ने 100-200 रुपए तो कुछ लोगों ने 5 हजार और 10 हजार रुपए भी दिए।

इन रुपयों से अशोक ने सबसे पहले अपनी पत्नी संगीता का गिरवी पड़ा मंगलसूत्र छुड़ाया। भाई से लिए 10 हजार का उधार वापस लौटाया। बिजली का बिल चुकाया और कुछ रुपए अपनी 25 साल की बेटी की शादी के लिए खाते में ही रहने दिए।

3-खेत में सड़ने को थी 950 क्विंटल गोभी, एक ट्वीट से तैयार हुए सैकड़ों खरीददार

लॉकडाउन के दौरान सोशल मीडिया न केवल एक दूसरे से जुड़े रहने का सबसे ताकतवर जरिया बना, बल्कि इसके जरिए कई जरूरतमंदों तक बेहद जरूरी मदद भी पहुंची।

तमिलनाडु के इरोड जिले के अरचलूर के किसान कन्नैयन सुब्रमण्यन के खेत में उपजी 950 क्विंटल बंद गोभी के खरीदार नहीं मिल रहे थे। चार लाख रुपए की उसकी लागत बेकार होने ही वाली थी कि तभी उनके दिमाग में एक विचार कौंधा।

उन्होंने 18 अप्रैल 2020 को ट्वीट किया कि 3.5 एकड़ में गोभी तैयार है। लॉकडाउन के चलते बेहद कम हुए दाम की वजह से यह बिक नहीं पा रही है। मैंने इसमें 4 लाख रुपए लगाए थे। क्या कोई कॉरपोरेट घराना मुझसे यह गोभी खरीदकर गरीबों और जरूरतमंदों में बांट सकता है।

उन्होंने इस ट्वीट में रतन टाटा और आनंद महिंद्रा को भी टैग किया। एक ही दिन में 3.40 लाख लोगों ने ट्वीट पढ़ लिया।

उनकी मदद के लिए सबसे पहले हाथ बढ़ाया WayCool Foods ने। यह एक स्टार्टअप है जिसने 35 हजार किसानों की मदद की है।

इस स्टार्टअप ने 5.5 रुपए किलो के हिसाब से कई गोभी खरीदी। इसके बाद कई और एनजीओ आगे आए और दस दिनों के भीतर करीब 450 क्विंटल बंद गोभी बिक गई। इसके बाद आने वाले हफ्तों में कन्नैयन की पूरी गोभी बिक गई।

4-अपनों ने साथ छोड़ा तो दूसरों के लिए डल झील में बना दी तैरती एम्बुलेंस

श्रीनगर में डल झील के रहने वाले तारिक अहमद पलटू अगस्त 2020 में कोरोना पॉजिटिव हो गए। क्या साथी क्या पड़ोसी, सभी उनका साथ छोड़ गए।

अपनों के इस व्यवहार से तारिक का दिल टूट गया। मगर अकेलेपन के इस अहसास का उन्होंने पॉजिटिव इस्तेमाल किया और अपने जैसे दूसरे लोगों की मदद के लिए श्रीनगर की पहली शिकारा एम्बुलेंस बना डाली।

तारिक का कहना है कि वह अब लोगों को दोष नहीं देते क्योंकि तब कोरोना को लेकर इतनी गलत जानकारियां थीं कि लोगों का वैसा बर्ताव स्वाभाविक था।

दरअसल, तारिक के पॉजिटिव आने के बाद शिकारावालों ने उनकी पत्नी को बैठाने से इनकार कर दिया। सब्जी वाले उनके घर सब्जी देने नहीं जा रहे थे।

तारिक को अस्पताल जाने के लिए अपने भाई को बुलाना पड़ा जो श्रीनगर के दूसरे हिस्से में रहता था। वह दो हफ्ते अस्पताल में रहे। इस दौरान सोचते रहे कि इस स्थिति को कैसे बदला जा सकता है।

ठीक होने के बाद तारिक डल झील पर एक्सपर्ट कमेटी की मेंबर डॉ. निवेदिता पी हरन के पास पहुंचे। यहीं से उन्हें यह आइडिया आया। उन्हें एम्बुलेंस को डिजाइन करने में एक महीना लगा। इस शिकारा में एक साथ 12 लोगों के लिए जगह है। तेजी से चलाने के लिए एम्बुलेंस में मोटर भी लगाई गई है। इसमें सभी जरूरी मेडिकल उपकरण भी हैं। तारिक का कहना है कि डल में रहने वालों में कोई भी उनके जैसे हालातों से न गुजरे।

5-स्कूल बंद हुए तो पुल के नीचे ‘नो-इंटरनेट’ वाले बच्चों को पढ़ाने पहुंचे टीचर

बात 1 जून 2020 की है। पूरे केरल में बच्चे घरों से ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे थे। मगर कोच्चि के सेंट जॉन बॉस्को अपर प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का एक ग्रुप अपने मम्मी-पापा के साथ बाजार में मछली बेच रहा था।

सात बच्चों के इस ग्रुप में मैसूर (कर्नाटक) से आए प्रवासी मजदूरों के बच्चे थे। ये परिवार पिछले 10 सालों से कोच्चि में थे और वहां के वल्लारपदम पुल के नीचे रहते थे। जब लॉकडाउन लगा तो इन बच्चों की पढ़ाई ठप हो गई। इनके पास ऑनलाइन पढ़ने के लिए न ही मोबाइल फोन था और न इंटरनेट कनेक्शन।

लॉकडाउन में बच्चे तो स्कूल जा नहीं सकते थे, तो उनके स्कूल की टीचर ही पुल के नीचे उन्हें पढ़ाने पहुंच गईं। स्कूल की हेडमिस्ट्रेस एलिजाबेथ फर्नांडीज समेत चार टीचर्स रोज इन बच्चों को पुल के नीचे पढ़ाने लगीं।

ये टीचर्स इन सात बच्चों को पढ़ाने के लिए अपने घरों से लंबी दूरी तय करके आती रहीं। टीचर्स अपने लैपटॉप पर एक दिन पहले वर्चुअल क्लास में हुई पढ़ाई को रिकॉर्ड करके लातीं और इससे बच्चों को पढ़ाती थीं।

जब टीचर पहुंचतीं तो वहां रहने वाले दूसरे परिवारों के छोटे बच्चे भी पढ़ने पहुंच जाते।

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