UP की सियासत से बड़ी खबर: पहली बार डिप्टी सीएम केशव के घर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ; दोनों के बीच लंबे समय से चल रही अनबन, एक हफ्ते पहले ही केशव ने कहा था- सीएम का चेहरा दिल्ली तय करेगा


लखनऊकुछ ही क्षण पहले

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उत्तर प्रदेश की सियासत से अब तक की सबसे बड़ी खबर आ रही है। पहली बार राजधानी लखनऊ में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के सरकारी आवास पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहुंचे हैं। दोनों के बीच बैठक का सिलसिला शुरू हो गया है। बताया जाता है कि लंबे समय से दोनों के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। डिप्टी सीएम और सीएम के बीच आपसी मनमुटाव कई बार खुलकर भी सामने आ चुकी है। एक हफ्ते पहले ही आगरा में आयोजित एक कार्यक्रम में केशव मौर्य ने कहा था कि यूपी में सीएम का चेहरा दिल्ली ही तय करेगा।

संगठन मंत्री और प्रदेश प्रभारी के साथ रात में हुई थी बैठक
सोमवार की रात ही BJP की कोर कमेटी की बैठक सीएम आवास में हुई थी। इसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा, केंद्रीय संगठन मंत्री बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह भी शामिल हुए थे। बताया जाता है कि इस दौरान केंद्रीय नेतृत्व के सामने भी दोनों के बीच की अनबन खुलकर सामने आई थी। केशव ने पार्टी और सरकार में उपेक्षा की शिकायत की थी।

बीच का रास्ता निकालने की कोशिश
यूपी में 2017 में BJP सरकार के गठन से लेकर अब तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बीच सब कुछ ठीक नहीं रहा है। कई बार दोनों के बीच का विवाद खुलकर सामने भी आ चुका है। 2017 विधानसभा चुनाव के दौरान केशव मौर्य ने पिछड़े वर्ग में काफी अच्छी पैठ बना ली थी। इसी के सहारे यूपी में BJP की सरकार बनी थी।

अब केशव के साथ 17% ओबीसी वोट बैंक है। इसे किसी भी हालत में BJP गंवाना नहीं चाहती है। वहीं, योगी के हिंदूवादी चेहरे को भी प्रदेश में काफी पसंद किया जाता है। ऐसे में पार्टी योगी और केशव दोनों को ही नाराज नहीं करना चाहती है। इसलिए अब बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जा रही है।

CM के दावेदार थे केशव, डिप्टी सीएम पद से संतुष्ट होना पड़ा
2017 विधानसभा चुनाव के दौरान केशव मौर्य की अध्यक्षता में ही BJP ने यूपी में शानदार जीत हासिल की थी। तब यह माना जा रहा था कि केशव ही अगले CM होंगे, लेकिन पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को कुर्सी सौंप दी। तब केशव को डिप्टी सीएम पद से ही संतोष करना पड़ा था। डिप्टी सीएम होने के बावजूद केशव को कम तवज्जो दी जाती रही।

योगी गुट के लोग हमेशा सरकार में हावी रहते। यहां तक की केशव अपने मन से अपने ही विभाग के अफसरों को ट्रांसफर भी नहीं कर पाते थे। इसके लिए भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंजूरी लेनी पड़ती थी। इससे केशव सरकार में होने के बावजूद खुश नहीं थे।

कब-कब योगी और केशव में टकराव हुआ?

  • 2017 में भाजपा की सरकार बनने के बाद केशव प्रसाद मौर्य का नेमप्लेट एनेक्सी मुख्यमंत्री कार्यालय से हटा दी गई थी। विवाद बढ़ने पर दोनों लोगों का कार्यालय सचिवालय स्थित विधान भवन में स्थापित किया गया।
  • केशव की अगुवाई वाली लोक निर्माण विभाग (PWD) के कामकाज की समीक्षा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद करने लगे थे। विभाग के अफसरों के साथ मुख्यमंत्री सीधे बैठक करने लगे थे। इससे केशव को दूर रखा जाता था।
  • मुख्यमंत्री ने PWD के कामकाज की समीक्षा शुरू की तो केशव प्रसाद मौर्य ने CM योगी के अधीन लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी में भ्रष्टाचार को लेकर मुखर हो गए। उन्होंने इसके लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग शुरू कर दी।
  • योगी आदित्यनाथ पर दर्ज मुकदमे आसानी से वापस हो गए, लेकिन केशव प्रसाद मौर्य की बारी आई तो फाइलें इधर-उधर होने लगी। PMO के हस्तक्षेप के बाद केशव के खिलाफ दर्ज मुकदमें हटा दिए गए।
  • PWD के एमडी की नियुक्ति भी मुख्यमंत्री कार्यालय से होती थी। केशव जिन अफसरों का नाम सुझाव में देते थे, उन्हें नहीं नियुक्त किया जाता था।
  • PWD निर्माण संबंधित जारी किए जा रहे बजट में मुख्यमंत्री कार्यालय के द्वारा बीते 4 साल में कई बार फाइलें वापस कर दी गई जिसको लेकर केशव प्रसाद मौर्य और मुख्यमंत्री कार्यालय में कई बार हंगामा हुआ।

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